
विश्वविद्यालय में एनएओपी के तृतीय क्षेत्रीय सम्मेलन एवं मनोविज्ञान विभाग के प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य उद्घाटन
सागर । डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के अभिमंच सभागार में नेशनल एकेडमी ऑफ साइकोलॉजी (NAOP) के तृतीय क्षेत्रीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ, जो कि विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के प्रथम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के साथ संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। सम्मेलन का उद्घाटन विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. डॉ. वाय.एस. ठाकुर के संरक्षण में किया गया। सम्मेलन के संयोजक डॉ. संचिता मीणा, सह-अभिभावक प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत (डीन, स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटी एंड सोशल साइंसेज) तथा एनएओपी के महासचिव प्रो. संजय कुमार (विश्वविद्यालय इलाहाबाद, प्रयागराज, उप्र) रहे। विभागाध्यक्ष एवं अध्यक्ष प्रो. उत्सव आनंद के नेतृत्व में मनोविज्ञान विभाग की टीम ने सम्मेलन का सफल आयोजन किया। आयोजन समिति में डॉ. दिव्या भनोट, डॉ. शारदा विश्वकर्मा एवं डॉ. देवकीनंदन शर्मा शामिल रहे। विशेष अतिथि के रूप में सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. रेखा बक्शी (गर्ल्स पी.जी. कॉलेज, सागर) उपस्थित रहीं।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. देवकीनंदन शर्मा द्वारा किया गया। प्रारंभ में डॉ. शारदा विश्वकर्मा ने स्वागत घोषणा के माध्यम से सभी अतिथियों का स्वागत किया, तत्पश्चात डॉ. देवकीनंदन शर्मा ने मंच पर उपस्थित प्रत्येक अतिथि का औपचारिक स्वागत कराया। विभागाध्यक्ष प्रो. उत्सव आनंद ने अपने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का अभिनंदन करते हुए मनोविज्ञान विभाग की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।
संयोजक डॉ. संचिता मीणा ने सम्मेलन की थीम “मैनमेकिंग टू नेशन बिल्डिंग- साइकोलॉजिकल साइंसेज फॉर सस्टेनेबल हेल्थ एंड वेलबींग फॉर विकसित भारत@2047” का परिचय देते हुए इसके उद्देश्य एवं प्रासंगिकता को श्रोताओं के समक्ष रखा। वक्ता डॉ. रेखा बक्शी ने “आई क्यू+ई क्यू+ एस क्यू = सक्सेस” का सूत्र प्रस्तुत करते हुए शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन, प्रतिस्पर्धा और अभिभावकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने विभिन्न आयु वर्गों की मनोविज्ञान को समझने की आवश्यकता पर बल दिया और युवाओं में बढ़ती आत्महत्या प्रवृत्तियों पर चिंता व्यक्त की।
कार्यक्रम के सह-अभिभावक प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने अपने संबोधन में सस्टेनेबिलिटी, मन और मानवता की परिभाषा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमें दूरदृष्टि से अधिक अंतर्दृष्टि पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि “समाज के लिए परिवार है, राष्ट्र के लिए समाज है और विश्व के लिए मानवता है।” उन्होंने वसुधैव कुटुम्बकम् और परहित सरस धर्म नहीं भाई की विचारधारा को राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण बताया।
एनएओपी के महासचिव प्रो. संजय कुमार ने अपने संबोधन में विश्वविद्यालय को एक व्यक्ति के “विजन और त्याग” का प्रतीक बताया। उन्होंने 1991 में एनएओपी की स्थापना के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय हर व्यक्ति एक-दूसरे से संघर्षरत था, इसी परिस्थिति में इस संस्था की स्थापना हुई। उन्होंने कहा कि आज डिजिटल युग में भी हम शिक्षा, जातिगत भेदभाव और गरीबी जैसी पुरानी समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनका समाधान देश के युवाओं में ही निहित है। डॉ. अंबेडकर के उद्धरण “लिबरेशन ऑफ़ माइंड इस अल्टीमेट फ्रीडम” का उल्लेख करते हुए उन्होंने युवाओं से समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व जैसे मूल्यों को स्थापित करने का आह्वान किया।
कुलगुरु प्रो. वाई.एस. ठाकुर ने राष्ट्र निर्माण पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि “दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं – जो दूसरों की बातें करते हैं, जो घटनाओं की बातें करते हैं और जो विचारों की बातें करते हैं,” तथा सभी से तीसरे वर्ग का हिस्सा बनने का आह्वान किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “वोकल फॉर लोकल” पहल का उल्लेख करते हुए स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया और विदेशी ब्रांडों के बजाय भारतीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की सलाह दी।
उद्घाटन समारोह के अंत में डॉ. दिव्या भनोट ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के समापन के साथ ही दो दिवसीय सम्मेलन का औपचारिक आरंभ हुआ, जिसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थी अपनी-अपनी शोध प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर एवं छात्र भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इस सम्मेलन में सहभागिता कर रहे हैं।











