
अटल बिहारी वाजपेयीः शुचिता, सुशासन और राष्ट्रबोध के शताब्दी पुरुष- भूपेन्द्र सिंह, पूर्व गृह मंत्री म.प्र. शासन वा विधायक
25 दिसंबर का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे युगपुरुष की जन्मतिथि के रूप में अंकित है, जिसने राजनीति को केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का संस्कार बनाया। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जन्मशती केवल एक स्मृति अवसर नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की वैचारिक, राजनीतिक और नैतिक यात्रा का पुनर्मूल्यांकन करने का क्षण है।
मुझे इस बात पर गर्व है कि मध्यप्रदेश सरकार में नगरीय विकास मंत्री रहते हुए सागर के अटल पार्क में महा मानव स्वर्गीय अटल विहारी बाजपेयी जी की प्रतिमा स्थापना हेतु शासन से एक करोड़ रूपये स्वीकृत कराने का अवसर मिला। मई 2023 में अटल जी की इतनी भव्य और विशाल प्रतिमा स्थापित हुई, वैसी देश में अन्यत्र कहीं नहीं है।
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में रहे, जिन्हें न केवल समर्थकों, बल्कि विरोधियों ने भी समान आदर दिया। वे तीन बार भारत के प्रधानमंत्री बनेकृ1996 में अल्पकाल के लिए, 1998दृ99 में और फिर 1999 से 2004 तक पूर्ण कार्यकाल के साथ। गठबंधन राजनीति के जटिल दौर में उन्होंने यह सिद्ध किया कि विविध विचारधाराओं के साथ भी स्थिर, भरोसेमंद और सिद्धांतनिष्ठ शासन संभव है।
उनके नेतृत्व का सबसे निर्णायक क्षण 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण रहे। वैश्विक दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं के बावजूद राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए लिया गया यह निर्णय भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है। इस साहसिक कदम ने देश के सामरिक आत्मविश्वास को नई ऊँचाई दी और यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब किसी की बैसाखी पर नहीं, अपने आत्मबल पर खड़ा है।
अटल जी की दूरदृष्टि आर्थिक और आधारभूत विकास में भी स्पष्ट दिखाई देती है। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, दूरसंचार क्रांति और सूचना प्रौद्योगिकी को मिला प्रोत्साहन आधुनिक भारत की विकास यात्रा के मील के पत्थर बने। सर्व शिक्षा अभियान, कृषि सुधारों की पहल, किसान क्रेडिट कार्ड और राष्ट्रीय किसान आयोग जैसे निर्णयों ने समावेशी विकास की नींव रखी। नदियों को जोड़ने की उनकी संकल्पना आज केनदृबेतवा जैसी परियोजनाओं के माध्यम से साकार हो रही है।
विदेश नीति में अटल बिहारी वाजपेयी ने साहस और संवाद का संतुलन साधा। अमेरिका के साथ नए संबंधों की शुरुआत और पाकिस्तान के साथ लाहौर बस यात्रा उनकी व्यावहारिक कूटनीति का प्रतीक थी। उनका प्रसिद्ध कथनकृ“हम दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं”कृआज भी उतना ही प्रासंगिक है। कारगिल युद्ध जैसे कठिन समय में भी उन्होंने संयम, दृढ़ता और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा।
25 सितंबर 1977 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिया गया उनका भाषण भारतीय कूटनीतिक इतिहास का ऐतिहासिक क्षण है। उस समय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर औपनिवेशिक भाषाओं का वर्चस्व था, लेकिन अटल जी ने हिंदी में बोलकर भारत की भाषायी स्वतंत्रता, सांस्कृतिक आत्मसम्मान और वैचारिक स्वायत्तता को वैश्विक मंच पर स्थापित किया। यह भाषण केवल शब्द नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे राष्ट्र की घोषणा थी।
लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनकी राजनीति की आत्मा थी। वे विपक्ष को शत्रु नहीं, बल्कि लोकतंत्र का आवश्यक स्तंभ मानते थे। संसद में उनकी भाषा मर्यादित, असहमति में भी शालीन और तर्कपूर्ण होती थी। अल्पमत में रहते हुए भी उन्होंने सिद्धांतों से समझौता नहीं कियाकृचाहे 1996 में सत्ता छोड़ना हो या 1999 में एक वोट से सरकार गिरना।
अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व राजनीति और कविता का दुर्लभ संगम था। एक कवि-हृदय नेता के रूप में वे राजनीति में संवेदनशीलता लेकर आए। उनकी कविताओं में राष्ट्र की पीड़ा, संघर्ष और आशा एक साथ झलकती है। उनका राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं, बल्कि समावेशी थाकृनारेबाज़ी से अधिक निर्माण और संवाद पर आधारित।
निजी जीवन में वे सादगी, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों के प्रतीक रहे। सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर रहते हुए भी उन्होंने राजनीति को निजी लाभ का साधन नहीं बनाया। यही कारण है कि उन्हें भारतीय राजनीति का “भीष्म पितामह” कहा गया और डॉ. मनमोहन सिंह से लेकर विभिन्न दलों के नेताओं ने उनके व्यक्तित्व और गरिमा की मुक्तकंठ से सराहना की।
आज जब राजनीति में शोर, कटुता और ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, अटल बिहारी वाजपेयी का जीवन और विचार एक मानक की तरह सामने आते हैं। वे केवल अपने समय के नेता नहीं थे, बल्कि भविष्य की राजनीति के लिए भी एक आदर्श छोड़ गएकृजहाँ शक्ति के साथ संयम, असहमति के साथ सम्मान और राष्ट्रवाद के साथ मानवीयता हो।
अटल बिहारी वाजपेयी गए नहीं हैं। वे अपनी भाषा, मर्यादा, दूरदृष्टि और मूल्यों के माध्यम से आज भी भारतीय लोकतंत्र को दिशा दिखा रहे हैं। उनकी जन्मशती हमें यह स्मरण कराती है कि राजनीति में भी शुचिता, संवाद और राष्ट्रबोध संभव हैकृयदि नेतृत्व अटल हो।











