
मन, वचन और कर्म में लोकतंत्र का समावेश आवश्यक: प्रो. गुरु प्रकाश
आधुनिक भारत की प्रथम महिला शिक्षिका तथा मानव मूल्यों की साक्षात प्रतिकृति क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले जी की 195 वीं जन्म जयंती के अवसर पर डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के समाजविज्ञान शिक्षण अधिगम केंद्र द्वारा सावित्रीबाई फुले की प्रतिमा पर माल्यार्पण कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के तहत छठा ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया| जिसका विषय “लोकतंत्र में संगठन और संगठन में लोकतंत्र” था|
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में विधि विभाग पटना विश्वविद्यालय के प्राध्यापक एवं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. गुरु प्रकाश पासवान ने अपने बीज वक्तव्य में बताया कि एक लोकतांत्रिक देश और खासकर भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र के उन्नयन का मूल तत्व वहां के नागरिकों में विद्यमान ‘हम की भावना’ एवं ‘अनेकता में एकता’ है| जिसकी व्यावहारिक परिणति के लिए नागरिकों का संगठित होना तथा परस्पर सम्बद्ध होना आवश्यक है क्योंकि संगठन में ही शक्ति होती है| सही अर्थों में कहें तो देश के यही संगठित नागरिक उस देश की सबसे बड़ी पूँजी हैं जिनके कन्धों पर राष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक, तकनीकी, शैक्षिक / बौद्धिक एवं नैतिक आदि पक्षों अर्थात् सर्वांगीण विकास की जिम्मेदारी है| सर्वांगीण विकास की इस संकल्पना को साकार करने में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| इसलिए हमारे विद्यार्थियों को दी जाने वाली शिक्षा अवश्य ही हमारी प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा से ही निर्गत होनी चाहिए| ताकि वे स्वयं को अपने राष्ट्र के मर्म को पूर्ण रूपेण जान सकें और उसे लगातार बदलती चली जा रही इस वैश्विक धरा पर पुनर्स्थापित कर सकें, क्योंकि भारतीय जीवन शैली, दर्शन एवं ज्ञान परम्परा ही हमें मिलकर रहने की प्रेरणा देती है| यही परम्परा हमें संगच्छध्वं संवदध्वं
सं वो मनांसि जानताम् और वसुधैव कुटुम्बकम जैसे मूल्यों को आत्मसात करना, अभ्यस्त तथा उनमें विचरण करना सिखाती है जिसकी आवश्यकता आज न केवल भारत अपितु समूचे विश्व को है|
इसी कड़ी में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. वाई. एस. ठाकुर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि हमें अपने विद्यार्थियों विशेषकर युवाओं को सीखने-सिखाने की भारतीय पद्धतियों से अवगत कराने के साथ-साथ उसमें तकनीकी का एकीकरण भी करना होगा| ताकि वे एक लोकतांत्रिक देश के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते यह भली-भाँति समझ सकें कि देश की प्रगति का रास्ता किस ओर जाना चाहिए और इसमें मूल्यों विशेषकर मानवीय मूल्यों की क्या भूमिका हो सकती है| क्योंकि हमारी सनातन भारतीय परम्परा में उन सार्वभौमिक मूल्यों का समावेश है जो चिरकालिक और देशकाल की सीमाओं से परे सर्वोच्च मूल्य हैं| ये मूल्य ही हमें सहयोग, सामंजस्य, सहायता और सहकारिता का बोध कराते हैं| इसलिए यह कार्य न केवल उच्च शिक्षा के स्तर पर और केवल शिक्षक के द्वारा किया जाना चाहिए बल्कि इसका आरम्भ शुरुआती विकासीय अवस्था से ही हो जाना चाहिए और इसे समुदाय की साझा जिम्मेदारी के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए|
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की कुलानुशासक प्रो. चन्दा बैन भी विशिष्ट अतिथि के तौर पर उपस्थित रहीं | उन्होंने अपने उद्वोधन में सावित्री बाई द्वारा शिक्षा, समता एवं न्याय की स्थापना के लिए किये गये संघर्षों की बानगी प्रस्तुत की|
कार्यक्रम की अंतिम बेला में जीवनपर्यंत शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर अनिल कुमार जैन ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों के प्रति औपचारिक आभार ज्ञापित किया| उन्होंने बताया कि आज से करीब दो सदी पूर्व सावित्रीबाई फुले ने जिन प्रतिकूल परिस्थितियों में कार्य करते हुए समाज को न्यायपूर्ण एवं समावेशी बनाने का प्रयास किया आज भी वे परिस्थितियाँ मौजूद हैं केवल उनका रूप परिवर्तित हुआ है|
कार्यक्रम में समाजविज्ञान शिक्षण अधिगम केन्द्र के समन्वयक एवं इस पूरे कार्यक्रम के सूत्रधार डॉ. संजय शर्मा, मीडिया अधिकारी डॉ. विवेक जायसवाल, डॉ चिठ्ठीबाबू, डॉ योगेश कुमार, डॉ शशिकुमार, डॉ. रूपाली सैनी, डॉ अभिलाषा, डॉ कल्पतरु दस, डॉ रामहेत एवं विभिन्न विभागों के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने ही सहभागिता नहीं की बल्कि पूरे देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले शिक्षा जगत से जुड़े व्यक्तियों ने भी सिरकत की|
कार्यक्रम में वक्ता परिचय एवं विषय प्रवर्तन एवं मंच संचालन डॉ. आफरीन खान ने किया|











