शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वाध्याय एवं सामूहिक जीवन के लिए सक्षम बनाना है- प्रो. सलूजा

शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वाध्याय एवं सामूहिक जीवन के लिए सक्षम बनाना है- प्रो. सलूजा
अकादमिक शिक्षा के साथ-साथ सामुदायिक जीवन कौशल आवश्यक है- कुलपति

जीवनपर्यंत शिक्षा विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्यप्रदेश) तथा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आई.सी.एस.एस.आर.), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में “उच्च शिक्षा में सामाजिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक सहभागिता : राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के संदर्भ में” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र विश्वविद्यालय के अभिमंच सभागार में किया गया. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. चाँद किरण सलूजा, विशिष्ट अतिथि प्रो. आर. पी. पाठक, प्रो. कौशल कुमार शर्मा, प्रो. प्रवीण तिवारी एवं प्रो. यशपाल थे. समारोह की अध्यक्षता कुलपति प्रो. वाय. एस. ठाकुर ने की. इस अवसर पर अधिष्ठाता प्रो. अनिल कुमार जैन एवं विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. सत्य प्रकाश उपाध्याय भी मंचासीन थे.

संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, पुष्प अर्चन एवं मंगलाचरण के साथ हुआ। स्वागत उद्बोधन में शिक्षा अध्ययनशाला के अध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार जैन ने कहा कि विश्वविद्यालय सामाजिक सरोकारों को साकार करने वाले विद्वानों का सदा स्वागत करता है। उन्होंने कुलपति का आभार व्यक्त करते हुए संगोष्ठी को समाजोन्मुखी शिक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास बताया। समन्वयक डॉ. योगेश कुमार पाल ने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के आलोक में सामाजिक उत्तरदायित्व, सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा सामुदायिक सहभागिता आज की अनिवार्य आवश्यकता हैं, जिनसे श्रेष्ठ नागरिक निर्माण एवं सामुदायिक समृद्धि संभव है।

मुख्य अतिथि प्रो. चांद किरण सलूजा ने अपने सारगर्भित वक्तव्य में सामाजिक दायित्व को शिक्षा का मूल उद्देश्य बताया। उन्होंने समान अवसरों, मौलिक कर्तव्यों, पर्यावरण संरक्षण, सहयोगात्मक अधिगम, “हाउ टू लर्न”, रचनात्मक आकलन तथा “कोई भी व्यक्ति अयोग्य नहीं है” जैसे विचारों पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को स्वाध्याय एवं सामूहिक जीवन के लिए सक्षम बनाना है। विशिष्ट अतिथि प्रो. रमेश प्रसाद पाठक ने कहा कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत समृद्धि के लिए नहीं, बल्कि वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को सुदृढ़ करने के लिए होनी चाहिए। उन्होंने डॉ. हरिसिंह गौर के त्याग और उनके द्वारा स्थापित विशाल सामाजिक विश्वविद्यालय के मूल्यों को स्मरण किया। प्रो. कौशल किशोर शर्मा एवं प्रो. आर. पी. पाठक ने भी उच्च शिक्षा की सामाजिक भूमिका, सामुदायिक सहभागिता तथा नीति-आधारित शैक्षिक सुधारों पर अपने विचार व्यक्त किए।

अध्यक्षीय भाषण में कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने कहा कि “प्राप्त ही पर्याप्त है” की भावना, स्वच्छता और सामुदायिक दायित्व आज के समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि संवाद का कोई विकल्प नहीं है तथा अकादमिक शिक्षा के साथ-साथ सामुदायिक जीवन कौशल और उनकी उपयोगिता को ध्यान में रखकर ही योग्यता का निर्धारण किया जाना चाहिए।

कुलसचिव डॉ. सत्य प्रकाश उपाध्याय ने आभार प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी उच्च शिक्षा को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध होने वाली है। उन्होंने मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, विशिष्ट अतिथियों, जीवन पर्यंत शिक्षा विभाग, शिक्षा शास्त्र अध्ययनशाला, ICSSR, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. योगेश कुमार पाल ने बताया कि इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विद्वान एवं सामाजिक चिंतक मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार प्रस्तुत करेंगे। वहीं, देश के विभिन्न राज्यों से पधारे प्रतिभागी (शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं अन्य शिक्षाविद) इस संगोष्ठी में सहभागिता कर अपने शोधपत्रों एवं विचारों के माध्यम से विमर्श को समृद्ध करेंगे.

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