ज्ञानमीमांसीय न्याय के लिए निष्पक्ष विचार की आवश्यकता है- प्रो. सच्चिदानंद मिश्र

ज्ञानमीमांसीय न्याय के लिए निष्पक्ष विचार की आवश्यकता है- प्रो. सच्चिदानंद मिश्र

विश्वविद्यालय के दर्शन शास्त्र विभाग द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न

सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित ‘ज्ञान, भ्रम और ज्ञानमीमांसीय अन्याय’ विषय पर केंद्रित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का रविवार शाम विश्वविद्यालय के रंगनाथन भवन में समापन हुआ। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् (ICPR), नई दिल्ली के वित्तीय सहयोग से आयोजित इस संगोष्ठी में देश भर के प्रख्यात विद्वानों ने संगोष्ठी के विषय पर मंथन किया।
इस त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में आमंत्रित विद्वानों के आठ तकनीकी सत्र आयोजित हुए जिनमें प्रमुख वक्तागण थे प्रो. रघुनाथ घोष (कलकत्ता), प्रो. आशा मुखर्जी (कलकत्ता), प्रो. अम्बिकादत्त शर्मा (वाराणसी), प्रो. दिलिप कुमार मोहन्ता (कलकत्ता), प्रो. निर्मल्य नारायण चक्रबर्ती (कलकत्ता), प्रो. शिवानी शर्मा (पंजाब), प्रो. विक्रम सिंह सिरोला (मुम्बई), प्रो. अनिर्बन मुखर्जी (दार्जिलिंग), प्रो. नटराजू (नई दिल्ली ), प्रो. अभिजीत जोशी (हैदराबाद), डॉ. नवीन दीक्षित (सांची), डॉ. अरूप ज्योति शर्मा (त्रिपुरा), डॉ. नीति सिंह (वाराणसी), डॉ. राजन (प्रयागराज), डॉ. चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह (मुजफ्फरपुर), अल्ताफ मुलानी (सागर), डॉ. देवदास साकेत (रीवा), डॉ. प्रमा चक्रबर्ती (कलकत्ता), डॉ. त्रिशा पाल (कलकत्ता)।
ऑनलाइन जुडे़ प्रो. पन्नीर सेल्वम (मद्रास), प्रो. पीयूष व्ही. थॉमस (असम), प्रो. हीरनारायण व्ही. (जोधपुर), प्रो. निर्भय मिश्रा (ग्वालियर), प्रो. अशोक कुमार तराई (कटक), प्रो. एल. विजई (तिरुवनंतपुरम)।
इसके अतिरिक्त दो सत्र डॉ. अनिल कुमार तिवारी की अध्यक्षता में शोधार्थियों एवं छात्रों की प्रस्तुति के लिए रखे गये जिनमें डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. अभय कुमार, डॉ. मनोहरलाल चौरसिया, शिव कुमार यादव, अक्षरा सिंघई, मयंक विनायक राय, कुशाग्र सोलंकी, अनन्या तिवारी, मिली जैन, कु. समीक्षा, आनंद दाँगी, स्मृति विजय ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किये।
द्वितीय दिवस के शाम सांस्कृतिक संध्या, का आयोजन विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में रखा गया। मंच संचालन स्नातक के छात्रों अथर्व मिश्रा, भूमी त्रिपाठी ने किया। प्रस्तुति दीपाली शर्मा, शीतल ठाकुर, ऋषिका शर्मा, श्रद्धा, आकृति सोनी, अल्शिफा ग्रुप, इकबालजीत सिंह, स्टी‍ना रजक, तनीशा मिश्रा एवं दर्शना देवलिया ने की। संगीत विभाग के छात्रों द्वारा संगीतमय प्रस्तुति दी गई। ललितकला एवं प्रदर्शनी कला विभाग के छात्रों द्वारा बधाई नृत्य प्रस्तुत किया गया। एक विशेष प्रस्तुति डॉ. राकेश सोनी द्वारा की गई।
ललितकला एवं प्रदर्शिनी कला विभाग के आचार्य आकाश मालवीय एवं उनके विद्यार्थी पारस अहिरवाल, साक्षी दुबे, पलक सोनी और उनके सहयोगियों द्वारा गोंड कला को स्मृति चिन्ह के रूप में तैयार किया गया जिसे आमंत्रित विद्वतजनों को भेंट के रूप में दिया गया।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा:
“भारतीय दार्शनिक परंपरा में ‘ख्याति’ पर जितना विचार है, उतना पाश्चात्य में नहीं। भारतीय परम्परा में प्रत्यक्ष प्रमाण का खण्डन नहीं है पर पाश्चात्य परम्परा में है। ज्ञानमीमांसीय न्याय के लिए निष्पक्ष विचार की आवश्यकता है।
विभागाध्यक्ष डॉ. तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी की समन्वयक डॉ. देबस्मिता चक्रबर्ती ने तीन दिनों तक चले विभिन्न सत्रों का विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। तत्पश्चात विभागाध्यक्ष द्वारा सभी प्रतिभागियों को शाल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया।
संगोष्ठी के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले स्नातक, स्नातकोत्तर और शोध छात्रों इकबालजीत सिंह, दीपाली शर्मा, आनंद दांगी, दिनेश कुमार, रिषिका यादव, अनीशा परिहार, दीपक सिंह, मयंक विनायक राय, अक्षरा सिंघई, शिव कुमार यादव, हिमांक चक्रबर्ती, हेमंत तिवारी, ओम कुमार रजक, विक्रम कुर्मी, विश्वास नायक, प्रशांत कुशवाहा, सूर्य प्रताप बुंदेला, अनुज चौरसिया, हरिओम, ओमकुमार रजक ,अर्पित नायक, अजय चौधरी, जया, अथर्व मिश्रा, भूमि त्रिपाठी, ‌‍‌सुशील सूरी, अनुरागदेव पाण्डेय, मेधांश की सराहना की एवं ललितकला एवं प्रदर्शनकला विभाग के डॉ. राकेश सोनी, आकाश मालवीय, मनोविज्ञान विभाग की डॉ. दिव्या भनोत, भूगोल विभाग की डॉ. शिवानी मीणा और दीपिका वशिष्ठ एवं दर्शनशास्त्र विभाग से डॉ. सत्यनारायण देवलिया और डॉ. नरेन्द्र कुमार बौद्ध का सहयोग हेतु धन्यवाद व्यक्त किया।
विभाग के सेवानिवृत्त आचार्य प्रो. ए.डी. शर्मा का उनके दार्शनिक अवदान पर सम्मान दर्शनशास्त्र विभाग एवं विश्वविद्यालय के अन्य विभागों के शिक्षकों द्वारा भी किया गया। प्रो. शर्मा ने अपने सेवाकाल के दौरान सागर से जुड़े अपने अनुभवों की चर्चा की।
इस अवसर पर प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे, पत्रकारिता विभाग से डॉ. विवेक जायसवाल, जीवनपर्यन्त शिक्षा विभाग से डॉ. संजय शर्मा, इतिहास विभाग से डॉ. पंकज सिंह, डॉ. आयुष गुप्ता, डॉ. दिवाकर कुमार झा, डॉ. अखिलेश सिंह, डॉ. विपिन कुमार, डॉ. अमितेश पाण्डेय आदि उपस्थित थे। धन्यवाद ज्ञापन संगोष्ठी की आयोजन सचिव डॉ. अर्चना वर्मा ने किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

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