रुद्राष्टाध्यायी (शतरुद्री) का पाठ है अमोघ, भगवान शिव को करता है प्रसन्न

अमोघ है शिवजी की रुद्राष्टाध्यायी(शतरुद्री)

शिवजी के पूजन में रुद्री का विशेष महत्व है,इस संसार में ऐसा कोई भी इससे बड़ा रहस्य नहीं है। ये सब पापो का नाश करने वाला है,प्रतिदिन प्रातः काल उठकर इस रुद्री का पाठ करने से उस पर भगवान शंकर प्रसन्न होते हैं और सभी मनोवांछित फल प्रदान करते हैं पृथ्वी पर इससे बढ़कर कोई दूसरी पवित्र वस्तु नहीं है यह संपूर्ण वेदों का रहस्य है मन वाणी और प्रिया द्वारा आश्रित समस्त पापों का नाश करने वाला है जो रुद्री का जप करता है वह रोग आतुर हो तो रोक से छूट जाता है कारागार में बंधा हुआ हो तो बंधनों से छुटकारा पा जाता है भयभीत हो तो भय मुक्त हो जाता है ।

वायु पुराण में कहा गया है जो व्यक्ति समुद्र पर्यंत वन पर्वत जल वृक्षों से युक्त तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त ऐसी पृथ्वी का दान करता है जो धन धान स्वर्ण औषधि से युक्त है उससे भी अधिक पुण्य एक बार के रुद्री जब एवं रुद्राभिषेक का है इसलिए जो भगवान रुद्र का ध्यान करके रुद्री का पाठ करता है तथा रुद्राभिषेक यज्ञ करता है वह उसी देर से निश्चित ही रुद्र स्वरूप हो जाता है इसमें संदेह नहीं है।
और कहा गया है कि रुद्राष्टाध्याई के प्रति दिन 3 बार जप करने से मनुष्य ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और जो सर्वदा रुद्र मंत्रों का जप करता है उसी प्रकार महादेव में प्रवेश करता है जिस प्रकार घर का स्वामी अपने घर में प्रवेश करता है जो मनुष्य अपने शरीर में भस्म लगाकर भस्म में शयन कर और जितेंद्रिय हो निरंतर रूद्र अध्याय का पाठ करता है वह परम मुक्ति को प्राप्त करता है जो रोगी और पापी जितेंद्रिय होकर रुद्राअध्याय का पाठ करता है वह रोग और पाप से मुक्त होकर अद्वितीय सुख को प्राप्त करता है

महाभारत में कहा गया है वेद सम्मत यह शत रुद्री परम पवित्र तथा धन यश और आयु की वृद्धि करने वाला है इसके पाठ से संपूर्ण मनोरथ की सिद्धि होती है यह संपूर्ण कष्टों का नाशक सब पापों का निवारण तथा सब प्रकार के दो और भय को दूर करने वाला है जो सदा उद्धत रहकर रुद्री को पड़ता और सुनता है तथा मनुष्यों में जो कोई भी निरंतर भगवान विश्वेश्वर का भक्ति भाव से वजन करता है वह उन त्रिलोचन के प्रसन्न होने पर समस्त उत्तम कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

जावाल उपनिषद में महर्षि याज्ञवल्क्य ने रुद्री को अमृत तत्व का साधन कहा है अर्थात जो शत रुद्री का पाठ करता है वह अग्नीपूत होता है,वायु पूत होता है, आत्मा पूत होता है ,सूरा पान के दोस्त से छूट जाता है, ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्त हो जाता है, स्वर्ण चोरी के पाप से छूट जाता है ,शुभाशुभ कर्मों से उधार पाता है भगवान शिव के आश्रित हो जाता है तथा अविमुक्त स्वरूप हो जाता है अतएव जो आश्रम से अतीत हो गए हैं उन परम हंसों को सदा सर्वदा कम से कम एक बार का पाठ अवश्य करना चाहिए इससे उस ज्ञान की प्राप्ति होती है जो भाव सागर का नाश कर देता है इसलिए इस प्रकार जानकर मनुष्य केवल मुक्ति को प्राप्त होता है केवल पद को प्राप्त होता है।

रुद्री का पाठ तीन प्रकार से होता है
1)पाठ आत्मक
पाठक में केवल संपूर्ण रुद्री का पाठ मात्र होता है

2)यज्ञ आत्मक
यज्ञ आत्मक में रुद्र मंत्र से हवन में आहुति दी जाती है उसे यज्ञ आत्मक पाठ कहते हैं

3)अर्चन आत्मक
अर्चन आत्मक में अनेक प्रकार के द्रव्यों से रुद्री मंत्र द्वारा शिवलिंग का रुद्राभिषेक किया जाता है अलग-अलग कामनाओं के लिए अलग-अलग धर्मों का प्रयोग किया जाता है।
जल से अभिषेक करने पर अंतःकरण की शुद्धि होती है

व्याधि के शांति के लिए उषा के जल से अभिषेक करना चाहिए

पशु एवं वाहन आदि सुख प्राप्ति के लिए दही से,

लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से धन की प्राप्ति के लिए मधु तथा जी से,

मोक्ष प्राप्ति के लिए तीर्थ के जल से

पुत्र की इच्छा रखने वाले दूध से अभिषेक करने पर प्राप्त करते हैं,

बंध्य स्त्री या एक संतान उत्पन्न करने वाली स्त्री को दूध से अभिषेक करने पर शीघ्र ही पुत्र प्राप्त करती है।

जल की धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है अतः अन्य द्रव ना मिलने पर केवल जल से अभिषेक करना चाहिए।

प्रमेह रोग के विनाश के लिए विशेष रूप से केवल दूध की धारा से अभिषेक करना चाहिए इससे मनोवांछित कामना की पूर्ति होती है।

बुद्धि की जड़ता को दूर करने के लिए शक्कर मिश्रित दूध से अभिषेक करना चाहिए ऐसा करने पर भगवान शंकर की कृपा से उसकी उत्तम बुद्धि हो जाती है ।

सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु का विनाश होता है ।
मधु के द्वारा अभिषेक करने पर तपेदिक रोग दूर होते हैं ।

दीर्घायु इक्षा वाले को गौ दूध से

लक्ष्मी की कामना वाले को गन्ने के रस से या शक्कर मिश्रित जल से सदा शिव का अभिषेक करना चाहिए

उपयुक्त विधि से महा लिंग का अभिषेक करने पर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।

शास्त्र कहते हैं कि रूद्र अध्याय के समान रखने योग्य स्वाध्याय करने योग्य वेदों और स्मृतियों आदि में अन्य कोई मंत्र नहीं है

एक विशेष बात ध्यान दें अत्यंत आवश्यकता हो तभी सकाम भाव से पूजन करना चाहिए अन्यथा निष्काम भाव से रुद्री का पाठ करना चाहिए इसका अनंत फल है निष्काम भाव से पाठ करने वाले जीव को इसी देश से निश्चित रूप से शुरू होकर शिव सायुज्य की मुक्ति प्राप्त होती है।।
कर्मकांड ज्योतिष विषेशज्ञ डॉ अनिल दुबे वैदिक देवरी बिछुआ 9936443138

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