
वास्तविक विकास वही है जिसमें मानव का विकास सुनिश्चित हो – प्रो. एस.पी. व्यास
सही भूगोल वक्ता नेचर लवर होता है – प्रो. एस.पी. व्यास
डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के स्कूल ऑफ एप्लाइड साइंसेज के अंतर्गत व्यवहारिक (व्यावहारिक) भूगोल विभाग द्वारा 12 एवं 13 फरवरी 2026 को “Climate Change, Economy and Health: Resilience and Adaptation for Sustainable Development of Viksit Bharat @2047” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन अत्यंत गरिमामय, शैक्षणिक एवं प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न हुआ। देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विशेषज्ञों की सक्रिय सहभागिता ने इस आयोजन को राष्ट्रीय विमर्श का स्वरूप प्रदान किया। कुल 73 प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा 41 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें अधिकांश अध्ययन प्राथमिक आँकड़ों पर आधारित थे ।
कार्यक्रम का शुभारंभ 12 फरवरी की प्रातः पंजीयन एवं स्वागत से हुआ। उद्घाटन उद्बोधन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर विनोद कुमार भारद्वाज द्वारा किया गया। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि विचारों की एकता और सामूहिक सहयोग किसी भी कार्यक्रम को सफल बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने विषय की समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विकसित भारत @2047 का स्वप्न तभी साकार होगा जब जलवायु, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य के बीच संतुलित समन्वय स्थापित किया जाएगा।
मुख्य अतिथि प्रो. वी.सी. झा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जलवायु परिवर्तन आज मानव सभ्यता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उपस्थित है। उन्होंने भू-स्थानिक तकनीकों, उपग्रह आंकड़ों और वैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता पर बल दिया तथा युवा शोधकर्ताओं को सटीक एवं प्रमाणित शोध की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। कुलपति प्रो. वाई.एस. ठाकुर ने प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि मानव की असीमित इच्छाएँ पर्यावरणीय संकट को जन्म दे रही हैं। उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के उपाय अपनाने का आह्वान किया। मुख्य वक्ता प्रो. कौशल के. शर्मा ने जलवायु, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य के त्रिस्तरीय संबंधों को स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि विकास मानवीय कल्याण और पर्यावरणीय संतुलन से पृथक हो जाए तो वह वास्तविक विकास नहीं रह जाता।
उद्घाटन सत्र के पश्चात आयोजित प्लेनरी सत्र में प्रो. रवींद्र जयभाये ने आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय स्थिरता के समेकित मॉडल को प्रस्तुत किया। उन्होंने सहभागी शासन, स्थानीय स्तर से ऊपर की ओर विकास और युवाओं की भूमिका को रेखांकित किया। डॉ. सुधीर कुमार सिंह ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जलवायु मॉडलिंग, जलवायु परिवर्तन के मापन तथा भविष्य की संभावित चुनौतियों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति में वृद्धि आने वाले दशकों में और अधिक स्पष्ट होगी।
प्रथम दिवस के तकनीकी सत्रों में संगोष्ठी की थीम के विविध आयामों पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। एक सत्र में जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय असंतुलन पर केंद्रित शोध प्रस्तुत किए गए, जिनमें भूमि उपयोग परिवर्तन, जल संकट और चरम मौसमी घटनाओं का विश्लेषण शामिल था। दूसरे सत्र में जलवायु परिवर्तन और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर चर्चा हुई, जिसमें कृषि उत्पादन, श्रम उत्पादकता, ग्रामीण आजीविका और आर्थिक विषमताओं के पहलुओं पर विचार रखे गए। तीसरे सत्र में स्वास्थ्य, जैव-जलवायु विज्ञान और मानव कल्याण से संबंधित शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। सभी तकनीकी सत्रों का समन्वय विभाग के विभिन्न प्राध्यापकों द्वारा किया गया, जिन्होंने अध्यक्षता, समीक्षात्मक टिप्पणियों और प्रश्नोत्तर के माध्यम से शैक्षणिक गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाया।
प्रथम दिवस की पैनल चर्चा “Climate Change and Health Risks” में स्वास्थ्य पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर गहन विमर्श हुआ। वक्ताओं ने बढ़ती ताप-लहरों, प्रदूषण, रासायनिक उर्वरकों के उपयोग और जल-जनित रोगों के संबंध में तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया तथा स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया।
12 फरवरी की संध्या को डॉ. राकेश सोनी एवं उनकी टीम द्वारा पारंपरिक कव्वाली, बुंदेलखंडी लोकनृत्य और लोकसंगीत की मनमोहक प्रस्तुति दी गई। यह सांस्कृतिक संध्या अत्यंत यादगार और भावनात्मक रही। विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। पारंपरिक वेशभूषा और सांस्कृतिक स्वर लहरियों ने वातावरण को जीवंत बना दिया तथा शैक्षणिक विमर्श को सांस्कृतिक संवेदना से जोड़ दिया।
द्वितीय दिवस के तकनीकी सत्रों में विकसित भारत @2047 की अवधारणा, सतत विकास, जलवायु परिवर्तन के आर्थिक निहितार्थ, स्वास्थ्य नीतियाँ तथा सूक्ष्म-स्तरीय केस स्टडी पर आधारित शोध प्रस्तुत किए गए। शोधार्थियों ने ग्लोबल वार्मिंग, कृषि प्रणाली में परिवर्तन, श्रम उत्पादकता में गिरावट तथा स्थानीय समुदायों की अनुकूलन रणनीतियों पर अपने निष्कर्ष साझा किए।
द्वितीय दिवस की पैनल चर्चा मुख्यतः जलवायु परिवर्तन और हिमनद (Glacial) उतार-चढ़ाव की प्रवृत्तियों पर केंद्रित रही। वक्ताओं ने वैश्विक तापवृद्धि के कारण हिमनदों के पिघलने, समुद्र-स्तर में वृद्धि और दीर्घकालिक जल-संकट की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। चर्चा में यह स्पष्ट किया गया कि हिमनदों के तीव्र पिघलाव से न केवल पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होगा, बल्कि कृषि, जल आपूर्ति और आर्थिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को समझने के लिए वैज्ञानिक निगरानी और नीति-स्तरीय हस्तक्षेप आवश्यक बताए गए।
समापन समारोह में मुख्य अतिथि प्रो. एस.पी. व्यास ने अपने संबोधन में कहा कि वास्तविक विकास वही है जिसमें मानव का विकास सुनिश्चित हो। उन्होंने भूगोल के विद्यार्थियों से प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि “सही भूगोल वक्ता नेचर लवर होता है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विकसित भारत @2047 का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब विकास की प्रक्रिया पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक न्याय और स्वास्थ्य सुरक्षा को समान महत्व दे।
अंततः संगोष्ठी के सफल आयोजन का श्रेय संयोजक डॉ. हेमंत पाटीदार एवं डॉ. सतीश सी. के कुशल नेतृत्व, विभागीय प्राध्यापकों के समन्वित प्रयास, शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी और विद्यार्थियों के अनुशासित सहयोग को जाता है। दोनों संयोजकों ने संपूर्ण कार्यक्रम की योजना, अतिथियों के आमंत्रण, शोधपत्रों के चयन, सत्रों के निर्धारण और व्यवस्थाओं के समन्वय का दायित्व प्रभावी ढंग से निभाया। विभाग के सभी संकाय सदस्यों द्वारा विभिन्न सत्रों का सफल संचालन किया गया, जिससे कार्यक्रम शैक्षणिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और सुव्यवस्थित सिद्ध हुआ। यह दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल अकादमिक उपलब्धि के रूप में स्मरणीय रहेगी, बल्कि विकसित भारत @2047 की दिशा में सार्थक वैचारिक पहल के रूप में भी मील का पत्थर सिद्ध होगी।











