भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधतापूर्ण संस्कृति में निहित है- सुदेश शर्मा

भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधतापूर्ण संस्कृति में निहित है- सुदेश शर्मा

राष्ट्रीय नाट्य समारोह के पहले दिन लोक नृत्य ढिमरयाई की प्रस्तुति

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में उत्तर-मध्यक्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं विश्वविद्यालय सांस्कृतिक परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 20 फरवरी से 24 फरवरी 2026 को पाँच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन किया जा रहा है । इस क्रम में सांस्कृतिक परिषद् के परिसर में लोक नृत्य ढिमरयाई की प्रस्तुति लोक कलाकार लीलाधर रैकवार एवं दल द्वारा दी गई| पूरे सत्र में लोक संस्कृति की समृद्ध परंपराओं का जीवंत प्रदर्शन देखने को मिला । कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुदेश शर्मा (उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज) थे | कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि द्वारा नटराज एवं डॉ. गौर के चित्र पर माल्यार्पण कर किया गया ।
लोक नृत्य दल ने माँ नर्मदा को नमन करते हुए मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक पहचान और मातृभूमि के गौरव का भावपूर्ण प्रस्तुतीकरण किया | प्रस्तुति के दौरान अनेक लोकगीतों का गायन हुआ | जिनमें लोकप्रिय गीत “हम गाड़ी से जेहें, पैदल न जेहें” विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा एवं पैरों में बंधे घुँघरुओं के साथ मंच पर जीवंत लोक वातावरण निर्मित किया। कलाकारों ने “उन वीरों को याद करे रहियो” के गीतों के माध्यम से बुंदेली महापुरुषों के बलिदान को याद किया। प्रस्तुति में खंजरी, सारंगी, ढोलक, लोटा एवं खड़ताल जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का प्रभावशाली प्रयोग किया गया ।

लोक कलाकार लीलाधर रैकवार ने बताया कि लगभग 400 वर्षों से चली आ रही ढिमरयाई लोककला का प्रारंभ ढिमरी जाति द्वारा किया गया था | जिसमें बाद में केवट, मांझी सहित अन्य समुदाय भी जुड़े। यह कला पूर्वकाल में जन मनोरंजन का प्रमुख माध्यम रही है तथा इसे अनेक सम्मान और पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके हैं। उन्होंने प्रत्येक लोक वाद्य यन्त्र का परिचय दिया और बताया कि इनको किन-किन अवसरों पर बजाया जाता है |

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज के निदेशक सुदेश शर्मा ने कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधतापूर्ण संस्कृति में निहित है। शास्त्रीय और लोक नृत्य ही वे माध्यम हैं, जो विश्व पटल पर भारत को एक विशिष्ट पहचान दिलाते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों को प्रेरित करते हुए कहा कि सागर की यह धरती बुंदेली वीरों की भूमि है और यहाँ के युवा कलाकारों के कंधों पर ही इस विरासत को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है। उन्होंने कलाकारों को ‘संस्कृति का सच्चा संरक्षक’ बताया।

समापन संबोधन में डॉ. राकेश सोनी ने बताया कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को उनकी जड़ों से जोड़ना है और उन्होंने छात्रों लोक परंपराओं से जुड़े रहने के लिए प्रेरित किया। डॉ. अवधेश तोमर ने बताया कि जिस प्रकार कोई वृक्ष अपनी जड़ों से जुड़े बिना फल नहीं दे सकता, उसी प्रकार समाज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होकर समृद्ध नहीं हो सकता। कार्यक्रम में डॉ. पंकज तिवारी, डॉ. अल्ताफ मुलानी, डॉ. विवेक जयसवाल उपस्थित रहे | कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीरज उपाध्याय ने किया |

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