डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा एक दिवसीय ऑनलाइन ‘द्वितीय सारस्वत व्याख्यानमाला’ का सफल आयोजन

डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा एक दिवसीय ऑनलाइन ‘द्वितीय सारस्वत व्याख्यानमाला’ का सफल आयोजन

*भगवान शिव से ही आरम्भ होती है छन्द:शास्त्र की परम्परा – डॉ. ऋषिराज पाठक

डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्त्वावधान में एक दिवसीय ‘सारस्वत व्याख्यानमाला’ का यह द्वितीय आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस व्याख्यान का विषय था-“वैदिक छन्दों का सामान्य परिचय एवं उनकी वेदार्थोपयोगिता”।
मुख्य वक्ता के रूप में श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक व सङ्गीत शिरोमणि उपाधि से विभूषित डॉ ऋषिराज पाठक उपस्थित रहे। उन्होंने विषय को अत्यंत सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करते हुए छन्द के लक्षणों एवं प्रमुख वैदिक छन्दों गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप् तथा जगती पर विस्तार से चर्चा की। डॉ. पाठक ने स्पष्ट किया कि छन्द वेद का एक प्रमुख अङ्ग है। वेद लक्ष्य है और वेदाङ्ग उसका लक्षण है। मुनि कात्यायन की उक्ति “यत् अक्षरपरिमाणं तत् छन्दः” को उद्धृत करते हुए उन्होंने छन्द की परिभाषा स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि छन्द:शास्त्र की परम्परा भगवान शिव से आरम्भ मानी जाती है। छन्द के दो मुख्य भेद ऋक् और साम का उल्लेख करते हुए उन्होंने वैदिक मंत्रों के उदाहरणों द्वारा छन्दों की वेदार्थ में उपयोगिता को रेखांकित किया। आगे उन्होंने बताया कि यद्यपि यजुर्वेद मुख्यतः गद्यात्मक है, तथापि उसमें भी छन्दात्मकता विद्यमान है। छन्द वेदांग भी है और लोकांग भी है, वैदिक छन्द ही लोक में उतरकर पद्य और गायन के रूप में उपस्थित हैं।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ निदेशक व शिक्षाविभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार जैन भी उपस्थित रहे। उन्होंने विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सच्चे अर्थों में भारतीय बने रहने के लिए भाषा का गहन अध्ययन आवश्यक है, जो व्याकरण एवं छन्दशास्त्र के अध्ययन से ही संभव है। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. किरण आर्या द्वारा किया गया। कार्यक्रम संयोजिका डॉ. किरण आर्या ने बताया कि इस व्याख्यानमाला का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा में निहित गूढ़ ज्ञान का संवर्धन एवं प्रसार करना है। यह व्याख्यानमाला प्रत्येक माह आयोजित की जाती है, जिसमें देश-विदेश के प्रतिष्ठित विद्वान् विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। इस ऑनलाइन संगोष्ठी में देश के विभिन्न प्रांतों से छात्र-छात्राएँ, शोधार्थी एवं समाज के अनेक जिज्ञासुजन जुड़कर ज्ञानार्जन करते हैं। प्रत्येक माह विषय-विशेषज्ञों को आमंत्रित कर सम्बन्धित विषय पर विस्तार से व्याख्यान कराया जाता है। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंगलाचरण से हुआ, जिसे संस्कृत विभाग के शोधार्थी सौरभ मिश्र ने प्रस्तुत किया। डा ऋषिराज का स्वागत एवं उनका परिचय संचालक मंडल , संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. नौनिहाल गौतम ने क दिया, इस कार्यक्रम में संचालक मंडल के डॉ. शशि कुमार सिंह तथा डॉ. रामहेत गौतम उपस्थित रहे। सभी ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि छन्द:शास्त्र जैसे विषय न केवल छात्रों, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए उपयोगी हैं और भविष्य में भी इस प्रकार के व्याख्यान आयोजित होते रहने चाहिए। कार्यक्रम में वैदिक अध्ययन विभाग से डॉ. आयुष गुप्ता, स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय,सागर, मध्यप्रदेश के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. सुकदेव वाजपेयी, तथा दिल्ली विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग से सह-प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार , डा राजमंगल यादव, डा अभय कुमार, एकलव्य विश्वविद्यालय दर्शन विभाग, डा प्रदीप दुबे शा. कृषि उच्च महाविद्यालय सागर, सहित अनेक विद्वान् एवं शोधार्थी ऑनलाइन माध्यम से उपस्थित रहे। कार्यक्रम की पूर्णरेखा तैयार करने वाले विभाग के शोधार्थी भूपेंद्र कुमार ने बताया कि इस आयोजन में व्याख्यान से लाभान्वित होने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को प्रतिभागिता प्रमाणपत्र भी दिया जाता है।

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