होली विशेष | बुंदेलखंड में फाग के बिना अधूरी है होली की उमंग

होली विशेष | बुंदेलखंड में फाग के बिना अधूरी है होली की उमंग

बुंदेलखंड में होली हो और फाग की गूंज न सुनाई दे, तो मानो त्योहार अधूरा रह जाता है। अपनी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध बुंदेलखंड में फाग गीत होली की आत्मा माने जाते हैं। फागुन माह के आगमन के साथ ही गांव-गांव चौपालों में ढोलक, मंजीरा और झांझ की थाप पर फाग गूंजने लगती है।
बुंदेलखंड की पहचान बन चुकी बुंदेली फाग केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि लोकजीवन, आस्था और प्रेम का प्रतीक है। इन गीतों में राधा-कृष्ण की लीलाओं, हास-परिहास और सामाजिक सरोकारों का सुंदर चित्रण होता है।
फाग की परंपरा और स्वरूप

फाग गाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। पहले यह पूरे बुंदेलखंड में व्यापक रूप से गाई जाती थी, लेकिन बदलते समय के साथ अब यह परंपरा मुख्यतः ग्रामीण अंचलों तक सीमित होती जा रही है। पुरुष चौपालों में बैठकर सामूहिक रूप से फाग गाते हैं, वहीं महिलाएं भी पारंपरिक परिधानों में समूह बनाकर फाग प्रस्तुत करती हैं।
जनकवि ईसुरी की अमर फागें
बुंदेली फाग के जनकवि के रूप में ईसुरी का नाम आदर से लिया जाता है। उन्होंने फाग की 32 विधाओं की रचना की और बुंदेली भाषा को लोकमानस में अमर कर दिया। उनकी फागों में रस, अलंकार और सहज लोकभावना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
फाग की प्रमुख विधाएं
बुंदेली फाग में चौकड़िया, डहका, सखयाऊ और खड़ी फाग प्रमुख रूप से गाई जाती हैं। हर विधा की अपनी अलग लय और प्रस्तुति शैली होती है। इन गीतों में हास्य, श्रृंगार और भक्ति का अनूठा मिश्रण दिखाई देता है।
‘अनरय’ की फाग – जीवन की नश्वरता का संदेश
बुंदेलखंड की विशेष परंपराओं में ‘अनरय’ की फाग भी शामिल है। यह फाग उन घरों में गाई जाती है, जहां हाल ही में किसी सदस्य का निधन हुआ हो। इन गीतों के माध्यम से जीवन की नश्वरता और संसार की क्षणभंगुरता का संदेश दिया जाता है।
होली के पांच दिवसीय उत्सव के दौरान रंग पंचमी तक फाग की धूम बनी रहती है। राधा-कृष्ण के प्रेम, हंसी-ठिठोली और लोकजीवन के रंगों से सजी फाग बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान है।
समय के साथ भले ही इसकी गूंज कुछ सीमित हुई हो, लेकिन आज भी ग्रामीण अंचलों में फाग की थाप पर बुंदेलखंड की आत्मा झूम उठती है।

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