
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन संपन्न
भारतीय ज्ञान परम्परा में भाषा, साहित्य एवं संस्कृति
सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के संस्कृत विभाग द्वारा रंगनाथन भवन में “भारतीय ज्ञान परम्परा में भाषा,साहित्य एवं संस्कृति ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य एवं सार्थक उद्घाटन किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, पुष्प अर्चन एवं वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ। आयोजन समिति के द्वारा अतिथियों का सत्कार किया गया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के कार्यक्रम की अध्यक्षता माननीय कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने की । मंच पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रो शिवशंकर मिश्र माननीय कुलगुरु महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय ,उज्जैन तथा बीज वक्ता के रूप में पूर्व कुलपति राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान , दिल्ली, सारस्वत अतिथि के रूप में डॉ अजय तिवारी, कुलाधिपति स्वामी विवेकानन्द विश्वविद्यालय, सागर एवं ऑनलाइन माध्यम से प्रणामी पीठ के महन्त स्वामी कृष्ण मणि महाराज उपस्थित रहे । मंच का संचालन संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉक्टर नौनिहाल गौतम ने किया ।
राष्ट्रीय संगोष्ठी की संयोजिका डॉक्टर किरण आर्या द्वारा स्वागत भाषण एवं प्रास्ताविकी प्रस्तुत की गयी। संस्कृत विभाग की प्रतिष्ठित नाट्यम् और सागरिका पत्रिका तथा “राधावल्लभ त्रिपाठी की सारस्वत साधना के विविध आयाम” पुस्तक, संपादक डॉक्टर रमाकांत पांडेय तथा पंडित प्रेम नारायण द्विवेदी रचित पुस्तक “शनि चालीसा” का विमोचन अतिथियों के द्वारा किया गया । ऑन लाइन माध्यम से उपस्थित स्वामी कृष्णमणि महाराज (जगदगुरु कृष्ण प्रणामी पीठ) ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा मूलरूप में परमात्मा से जुडी हुयी है जिस ज्ञान की हम अभिव्यक्ति करते है उसमें भाषा महत्त्वपूर्ण होती है। भारतीय भाषाओ की जननी संस्कृत भाषा है । हमारे पास संस्कृत साहित्य में विपुल भंडार उपलब्ध हैं । स्वामी जी ने ज्ञान को किस प्रकार भाषा और साहित्य के माध्यम से व्यक्त किया जाता है, इस पर बल दिया । संगोष्ठी के इस अवसर पर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) और महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय ,उज्जैन के मध्य परस्पर सहयोग ज्ञापन(MOU) संपन्न हुआ ।
अध्यक्षीय आशीर्वचन में माननीय कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने कहा कि भारतीय संस्कृति के प्रत्येक कार्य में मनोविज्ञान छिपा हुआ है जैसे माथे पर चन्दन लगाने से मन शांत रहता है वैसे ही संस्कृत रूपी चंदन हमारे जीवन में शांति प्रदान करता है।
ज्ञानी पुरुष प्रकृति की भाषा को समझते और उस पर विचार करते है । बरगद की पूजा, कुआँ पूजा, पीपल के पेड़ की पूजा आदि वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं । हमारी प्राचीन ज्ञान परम्परा को बाहरी आक्रान्ताओं द्वारा नष्ट किया गया । उन्होंने पांडुलिपियों में छिपे हुए ज्ञान के अध्ययन की आवश्यकता बताते हुए कहा कि जो भी प्राचीन ग्रन्थ हैं उनका २५ प्रतिशत भी अध्ययन अभी नही किया गया है । कुलपति जी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए । पश्चिमी देश हमारे ज्ञान को मानने को बाध्य हैं । ज्ञान परम्परा की रक्षा करना बहुत जरुरी है । शास्त्र और शस्त्र दोनों का ज्ञान होना जरुरी है । कुलपति जी कहा कि कुछ देशों में १२ वीं के बाद सैनिक प्रशिक्षण जरुरी है । कुलपति ने कहा कि हर नागरिक को सैनिक की तरह दृढ़ होना चाहिए जो हमारी ज्ञान परम्परा को सुरक्षित रख सके ।
बीज भाषण कर्ता के रूप उपस्थित प्रो राधा वल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि 20 वीं सदी के सबसे बड़े विद्वान् पंडित बच्चू लाल अवस्थी जी हैं । त्रिपाठी जी कहा कि हिंदी के लोगों ने संस्कृत को पाला पोसा और बड़ा किया, इसी तरह संस्कृत ने भी । यह सहकार बना रहे । 1964 से प्रकाशित सागरिका एक अन्त्तरराष्ट्रीय पत्रिका है यह विदेश में संस्कृत विभाग सागर विश्वविद्यालय की पहचान है। 1982 में नाट्यम् पत्रिका शुरू की गयी । विश्व के महान् कथाकार गार्शिया मार्फेज के उपन्यास में गाँव के यथार्थ का चित्रण प्रस्तुत किया और स्मृतिभ्रंश का उदाहरण दिया ।जो दुनिया गुम हो गयी थी उसे हमने भाषा के सहारे उबार लिया । दुनिया जब अँधेरे में डूब जाती है तो भाषा उसे उबार लेती है । वाक् से ही दुनिया पैदा हुई है । ज्ञान मीमांसा के क्षेत्र में भाषा दर्शन और व्याकरण दर्शन, भारत की देन है । विचारों की दुनिया में विचारों का आदान प्रदान होता है । महान् विचार किसी के मन में भी आ सकते हैं । प्रतिभा विश्व में कहीं भी पैदा हो सकती है । उत्तर आधुनिकता विमर्श भाषा को लेकर शुरू हुआ । पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि भाषा में होती है । भाषा से दुनिया जन्म लेती है, भाषा ही नाम देती है । हमारे यहाँ भर्तृहरि जो बताते हैं, दुनिया उसे स्वीकार करती है । भाषा साहित्य और संस्कृति की धरती है । भाषा की धरती पर संस्कृति के उपवन पनपते हैं। संकृति के उपवन के बिना कविता, साहित्य पोषित नहीं होते । प्रोफेसर त्रिपाठी ने पंडित जवाहर लाल नेहरु की ऑटो बायोग्राफी की चर्चा करते हुए कहा कि यदि उनको साहित्य के रूप में जाना जाता तो उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलता। एक शब्द के प्रयोग द्वारा स्वर्ग और नरक प्राप्त हो जाते हैं । भारतीय ज्ञान परंपरा में छःवेदांगों के महत्व की चर्चा उन्होंने की। जैसे सुपारियों की मंडी के कारण गुवाहाटी नाम पडा । हर भाषा की अपनी लय होती है। भाषा का प्रयोग करना सीखें, यही संगोष्ठी का सन्देश है ।
सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित डॉक्टर अजय तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा प्रचार हेतु सरकार और विभिन्न संस्थान कार्य कर रहे हैं। हमें अपनी भाषा के साथ साथ दूसरी भाषा का भी ज्ञान होना चाहिए। संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है अमेरिका के नासा में संस्कृत के ग्रन्थ पढने के लिए विद्वानों की मांग है। हमारी परम्पराओं से ही व्यक्तित्व का विकास होता है । हमारी संस्कृति पल्लवित करने की संस्कृति है । उन्होंने संगोष्ठी को समाजोन्मुखी शिक्षा की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास बताया ।
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो शिवशंकर मिश्र जी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा प्राचीनतम है, जो वेदों से आरंभ होकर आधुनिक काल तक विस्तृत है। भाषा इसका आधार है, जिसमें संस्कृत की समृद्धि प्रमुख है—देववाणी के रूप में वेद, उपनिषदि और पुराणों को समाहित करती हुई। पाली और प्राकृत ने बौद्ध-जैन साहित्य को समृद्ध किया, जबकि तमिल संगम साहित्य द्रविड़ परंपरा का प्रतीक है। साहित्य ज्ञान का भंडार है: ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर कालिदास के अभिज्ञानशाकुंतलम् तक, जो दर्शन, नीति और काव्य का संगम रचते हैं।
कार्यक्रम के सफलतापूर्वक शुभारंभ के अवसर पर संगोष्ठी निदेशक प्रो .राजेंद्र यादव ने आभार ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, विशिष्ट अतिथियों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि यह संगोष्ठी सार्थक सिद्ध होने वाली है। संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का समापन राष्ट्रीय गीत और वन्दे मातरम् के साथ किया गया ।
इस अवसर पर प्रोफेसर नागेश दुबे, प्रोफेसर संजय कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय, डॉक्टर अखिलेश कुमार द्विवेदी उज्जैन, डॉक्टर सुकदेव वाजपेई, डॉक्टर बबलू राय, डॉक्टर ऋषभ भारद्वाज, डॉक्टर बृजेश रिछारिया, डॉक्टर स्वर्णलता तिवारी, डॉक्टर अखिलेश कुमार मिश्र, डॉ अनिल तिवारी, डॉक्टर अच्छे लाल, डॉक्टर राम रतन पांडे, डॉक्टर रामहेत गौतम, डॉक्टर शशिकुमार सिंह, प्रोफेसर गोपाल लाल मीणा, डॉक्टर निकिता यादव, डॉक्टर प्रदीप दुबे, प्रोफेसर अनिल कुमार जैन, डॉक्टर संजय दुबे भोपाल, डॉ मनीष दुबे दमोह आदि उपस्थित रहे।











