
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त का योगदान: ‘विद्वान और दार्शनिक का दुर्लभ संगम’ – डॉ. नीरज दुबे
अभिनवगुप्त ने दिया ‘नवम शांत रस’, उनका दर्शन ‘ब्रह्म और जगत दोनों को सत्य’ मानता है – कुलगुरु डॉ. विनोद मिश्र
सागर/ मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग, भोपाल एवं पी.एम. ऊषा योजना के सहयोग से “भारतीय ज्ञान परंपरा में महामाहेश्वर अभिनवगुप्त का योगदान” विषय पर पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य (अग्रणी) महाविद्यालय, सागर के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आदिगुरु शंकराचार्य सभागार में भव्य शुभारंभ हुआ। इस संगोष्ठी का केंद्रीय उद्देश्य कश्मीर के महान दार्शनिक, तत्त्वज्ञ, सौन्दर्यशास्त्री एवं योगी महामाहेश्वर अभिनवगुप्त (950-1016 ई.) के अद्भुत योगदान को भारतीय ज्ञान परंपरा की दृष्टि से पुनः समझना और समकालीन परिप्रेक्ष्य में उनके विचारों की प्रासंगिकता पर विमर्श करना है।
उद्घाटन सत्र उच्च शिक्षा विभाग के क्षेत्रीय अतिरिक्त संचालक डॉ. नीरज दुबे के मुख्य आतिथ्य एवं रानी अवंती बाई लोधी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. विनोद मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। मंच पर महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता, प्रशासनिक अधिकारी डॉ. इमराना सिद्दीकी, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय भोपाल के निदेशक डॉ. रमाकांत पांडे, अगस्त्य संस्थान भोपाल के अध्यक्ष पं. प्रभु दयाल मिश्रा व महर्षि योगी वैदिक विश्वविद्यालय भोपाल के आचार्य डॉ. नीलिम्प त्रिपाठी आसीन रहे।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. नीरज दुबे ने अपने प्रभावशाली संबोधन में अभिनवगुप्त को केंद्र में रखते हुए कहा कि वे कश्मीर के विद्वान और दार्शनिक व्यक्ति थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी व्यक्ति का एक साथ विद्वान और दार्शनिक दोनों होना ‘दुर्लभ संगम’ है। उन्होंने बताया कि शिवजी के बड़े उपासक होने के कारण ही अभिनवगुप्त को ‘महामाहेश्वर’ की उपाधि प्राप्त हुई थी। उन्होंने संगोष्ठी के आयोजकों को इस महत्वपूर्ण विषय के चयन के लिए बधाई दी।
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु डॉ. विनोद मिश्र ने अभिनवगुप्त को कश्मीर शैव दर्शन के संदर्भ में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति बताया। उन्होंने तर्कशास्त्र, त्रिक दर्शन और कौलिक दर्शन के ज्ञाता अभिनवगुप्त को ‘साक्षात् मार्तण्ड’ (साक्षात् सूर्य) की उपाधि से विभूषित किए जाने का उल्लेख किया। डॉ. मिश्र ने अभिनवगुप्त द्वारा स्थापित नवम ‘शांत रस’ के योगदान पर विशेष बल दिया और कहा कि शांत भाव केवल मौन होना नहीं, बल्कि एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था है।
संगोष्ठी के प्रारंभ में महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने सभी आगंतुक विद्वानों, अतिथियों और शोधार्थियों का हार्दिक स्वागत किया। उन्होंने महामाहेश्वर अभिनवगुप्त जैसे महान दार्शनिक के विचारों पर राष्ट्रीय विमर्श के महत्व को रेखांकित किया।
इस अवसर पर उनकी रचनाओं पर आधारित पुस्तक “दूर और नजदीक : सरोज गुप्ता” का विमोचन मंचासीन अतिथियों ने किया।
उद्घाटन सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. रमाकांत पांडे ने अभिनवगुप्त के अध्ययन को ‘चूड़ान्त’ (अत्यधिक गहन) बताया। उन्होंने कहा कि अभिनवगुप्त की गुरु परंपरा शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन से भिन्न है। उन्होंने कहा कि उनकी परंपरा में ‘ब्रह्म भी सत्य है और जगत भी सत्य है’।
आचार्य डॉ. नीलिम्प त्रिपाठी ने नवम ‘शांत रस’ को प्रकट करने के लिए अभिनवगुप्त पादाचार्य को श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि शांत रस के बिना किसी भी अभिव्यक्ति का कोई अर्थ नहीं है और जो अनुभव ग्रहण करता है, उसमें रस होता है, न कि कहने वाले में।
सारस्वत वक्ता पं. प्रभु दयाल मिश्रा ने अपने उद्बोधन में वैष्णव भक्ति परंपरा में ‘द्वैत’ के महत्व का उल्लेख किया तथा ‘मिथ्या’ और ‘भ्रम’ की दार्शनिक अवधारणाओं पर विचार प्रस्तुत किए। इस दौरान डॉ आशीष द्विवेदी तथा मनोज पांडे भी मौजूद रहे।
संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र का संचालन हिंदी विभाग के डॉ. अवधेश प्रताप सिंह ने किया, जबकि प्रशासनिक अधिकारी डॉ. इमराना सिद्दीकी ने उपस्थित सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार प्रदर्शन किया।
दो दिवसीय इस संगोष्ठी के प्रथम दिवस के विचार सत्र में अभिनवगुप्त के तंत्र, दर्शन, साहित्य, संगीत, नाट्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्र जैसे विविध क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान पर चर्चा शुरू की गई है। प्रथम दिवस के विचार सत्र की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली के सह आचार्य डॉ. योगेश शर्मा ने की। इस सत्र के मुख्य वक्ता महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा के डॉ प्रदीप शास्त्री थे। सारस्वत वक्ता के रूप में नई दिल्ली से साहित्य आलोचना एवं सौन्दर्य शास्त्र विशेषज्ञ नीता खन्ना, पूर्व कुलपति व संस्कृत के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी (आनलाईन) तथा एमए राजनीति विज्ञान के छात्र अश्वनी तिवारी राहुल ने डॉ संदीप सबलोक के सहयोग से प्रस्तुत शोध पत्र का वाचन करते हुए अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन डॉ राणा कुंजर सिंह ने तथा आभार प्रदर्शन डॉ जय कुमार सोनी ने किया।
इस दौरान महाविद्यालय की वरिष्ठ प्राध्यापक गोपा जैन, डॉ अमर कुमार जैन, डॉ संगीता मुखर्जी, डॉ प्रतिभा जैन, डॉ संगीता कुंभारे, डॉ अभिलाषा जैन, डॉ संदीप सबलोक, डॉ राणा कुंजर सिंह, सुरेन्द्र यादव, डॉ प्रकाश कुशवाहा, डॉ अनुरोध चढ़ार, डॉ देवेंद्र सिंह ठाकुर, अनुष्का राजे, डॉ राहुल बर्दिया, डॉ रेणु सोलंकी, डॉ अंकुर गौतम, डॉ संदीप तिवारी, डॉ रविन्द्र सिंह, डॉ सीपी सिंह, डॉ कनिष्क तिवारी, डॉ अखिलेश तिवारी, डॉ शैलेंद्र राजपूत, डॉ वरुण राज यादव रश्मि दुबे, डॉ राखी गौर, सुनील प्रजापति, डॉ अनिल महरौलिया, डॉ मनीष जैन, डॉ संजय राय, डॉ शालिनी परिहार, प्रतीक्षा जैन, गुलफ्शा कसाब, आकांक्षा सोनी, समेत बड़ी संख्या में शोधार्थी व छात्र छात्राओं की उपस्थिति रही।
महाविद्यालय में दो दिन तक चलने वाली इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के संबंध में डॉ संदीप सबलोक ने बताया कि शुक्रवार 31 अक्टूबर को भी सुबह 11 बजे से देश के विभिन्न राज्यों से विद्वान, शोधार्थी एवं प्राध्यापक सम्मिलित होकर अभिनवगुप्त के विचारों पर सारगर्भित विमर्श करेंगे।











