विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में “विश्व दर्शन दिवस” मनाया गया

विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में “विश्व दर्शन दिवस” मनाया गया
सागर डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में “विश्व दर्शन” दिवस मनाया गया। इस कार्यक्रम की थीम “आज डिजिटल युग और आलोचनात्मक, रचनात्मक चिंतन” रही। इस आयोजन की अध्यक्षता डॉ. देवस्मिता चक्रबर्ती ने की। डॉ. अर्चना वर्मा इस कार्यक्रम की समन्वयक रहीं और इस कार्यक्रम में अतिथि विद्वान डॉ. नरेंद्र कुमार बौद्ध शोधार्थी अक्षरा सिंघाई, गौरव कुमार, मयंक विनायक राय एवं छात्र-छात्राओं ने अपनी सहभागिता दी। इस अवसर पर डॉ. देवस्मिता चक्रबर्ती ने विश्व दर्शन दिवस पर प्रकाश डालते हुए कहा कि दर्शन सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित न होकर संपूर्ण जीवन से संबंधित है। इसको हम रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होलकर के जीवन से भरी बातें समझ सकते हैं जो गैर-दार्शनिक होने के बावजूद भी अपनी जीवन को दार्शनिक आधार पर संचालित करती रहीं। इस कार्यक्रम के सत्र का संचालन शोधार्थी विभा पाण्डेय ने किया। उन्होंने कहा कि आज डिजिटल युग ने कैसे हमारी आलोचनात्मक चिंतन को धीरे-धीरे बाधित किया और ऐसी स्थिति में आलोचनात्मक चिंतन को बढ़ावा देने में दर्शन कैसे प्रासंगिक हो सकता है इस पर प्रकाश डाला। डॉ. अर्चना वर्मा ने कहा कि दर्शन परंपरागत रूप से जीवन जीने की शैली रहा है। दर्शन हमें एक सार्थक जीवन जीने का व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। इस कार्यक्रम में शोधार्थी एवं विविध छात्र और छात्राओं ने भी अपने-अपने विचार व्य्क्त किए। जैसे सेकेण्ड ऑर्डर थिंकिंग में हम किसी चीज का प्रभाव हम पर कैसे पड़ता है पर प्रकाश डाला। दर्शन का लक्ष्य स्वयं की खोज करना अहंकार का विनाश करना बताया। आलोचनात्मक चिंतन में कैसे भाषा से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। दर्शन को कैसे विश्वा स्तर तक लेकर जाए पर विचार रखे। अतः दर्शन एक ऐसा विषय है जिसको किसी निश्चित दिन या दायरे में सीमित नहीं किया जा सकता है।

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