मानवता की सार्वभौमिकता ही शिक्षा का लक्ष्य है- प्रो. जगमोहन सिंह

मानवता की सार्वभौमिकता ही शिक्षा का लक्ष्य है- प्रो. जगमोहन सिंह
शिक्षा को नई चुनौतियों के लिए वैश्विक नागरिक तैयार करना होगा – प्रो. ठाकुर

सागर . 17 वें राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर जीवनपर्यंत शिक्षा विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के द्वारा ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया| जिसका विषय “शिक्षा में सार्थकता के अवरोधक” था| कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध शिक्षाविद पद्मश्री प्रो. जगमोहन सिंह राजपूत ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय जड़ों से निर्गत और पोषित तथा प्रगति के लिए संकल्पित और प्रतिबद्ध शिक्षा पद्धति का विकास करना चाहती है | नीति के इस मूल दर्शन का मुख्य स्त्रोत हमारे मनीषियों की साधना एवं चिंतन से विकसित हुई हमारी प्राचीन, समृद्ध एवं महान शिक्षा परम्परा ही है| जिसमें ज्ञान प्राप्ति की लालसा के साथ-साथ बुद्धि / प्रज्ञा, विवेक, दर्शन, विचार और आध्यात्म का भी समावेश है| इतना ही नहीं यह ‘मानवता की सार्वभौमिकता’ और ‘धनात् धर्मं ततः सुखं’ जैसे विचारों से निर्गत शिक्षा प्रणाली है| जिसकी आवश्यकता भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को है| यही संकल्पनाए शिक्षा नीतियों की पृष्ठभूमि में होनी चाहिए, क्योंकि शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है| शिक्षा की इस महती भूमिका को और अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने कहा कि आजादी के पूर्व गांधीजी ने भी इस बात को स्वीकार किया कि स्वतंत्रा प्राप्ति के तुरंत बाद भी हमें सुख प्राप्त नहीं होगा क्योंकि दोषपूर्ण चुनाव प्रणाली, अन्याय, धनिक वर्ग का अत्याचार और प्रशासन चलाने का भार ये चार चुनौतियां हमारे सामने सदैव बनी रहेगी| किन्तु शिक्षा अगर सभी तक पहुंच जाए जिसके परिणामस्वरूप सभी मनुष्यों को मनुष्यत्व के साथ जीवन जीने के अवसर मिलेंगे तो इन कमियों को दूर किया जा सकता है क्योंकि शिक्षा ही एकमात्र किरण है जो इन सभी बुराइयों को दूर कर सकती है| इस विचार की व्यावहारिक परिणति हेतु हमारे शिक्षक मुख्य एजेंसी हैं| अतः इस संदर्भ में हमें मुख्यतः चार बिन्दुओं के प्रति विचारशील रहना होगा और बड़ी ही सजगता से इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने होंगे| जिनमें शामिल हैं- किसे पढ़ाना है? (विद्यार्थी की समझ), क्या पढ़ाना है? (पाठ्यक्रम एवं विषयवस्तु के प्रति जागरूकता), कैसे पढ़ाना है और कौन पढ़ायेगा (शिक्षकों की तैयारी)?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भी इस बात को स्वीकार किया कि शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था और सम्पूर्ण समाज को यह दिशा दे सकते हैं| किन्तु दुर्भाग्य से हमारे यहाँ अध्यापक शिक्षा संस्थानों की खराब गुणवत्ता, परिवर्तन की स्वीकार्यता और उस प्रक्रिया में सहभागिता का अभाव, स्वायतत्ता, आर्थिक, नैतिक मूल्यों का संकट तथा प्रगति उन्मुख शिक्षा पद्धति को अपनी संस्कृति से सम्बद्ध करना तो अभी भी चुनौतीपूर्ण कार्य हैं ही| इतना ही नहीं विचार शक्ति, कल्पनाशीलता, नवाचार जिज्ञासा एवं सृजनशीलता जैसी क्षमताओं को जहाँ शिक्षा प्रक्रिया के परिणामस्वरूप और अधिक विकसित एवं प्रखर होना चाहिए, इसके बिपरीत हमारी शिक्षा पद्धति इन क्षमताओं को लगातार कुंद बनाती जा रही है इस पर गंभीरता से विचार किये जाने की आवश्यकता है| कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने की | अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. ठाकुर ने बताया कि वर्तमान में शिक्षा के समक्ष गुणवत्ता को बनाये रखना सबसे बड़ी चुनौती है. उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि स्कूली शिक्षा में रहते हुए भी बच्चे सीख नहीं रहे है. वैशिक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्रांति, साइबर युद्ध और भू-राजनीतिक अस्थिरता जैसी नई वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा प्रणाली को पूरी तरह से पुनर्गठित करना होगा। कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष एवं शैक्षिक अध्ययनशाला के अधिष्ठाता प्रो. अनिल कुमार जैन ने राष्ट्रीय शिक्षा दिवस पर देश के प्रथम शिक्षामंत्री भारतरत्न मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शिक्षायी योगदान को रेखांकित करते हुए इसे आधुनिक भारत के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण बताया | प्रो. जैन ने ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि ऐतिहासिक भारत की सांस्कृतिक पूंजी को मौलाना आज़ाद ने शिक्षा के माध्यम से अक्षुण रखा है |
कार्यक्रम का संचालन डॉ. योगेश कुमार पाल तथा आभार ज्ञापन डॉ. चिट्टीबाबु पुच्चा द्वारा किया गया | इस व्याख्यान कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों तथा देश के विभिन्न भागों से शिक्षाविदों, शैक्षिक प्रशासकों, संस्था संचालकों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों आदि ने भी आभासी पटल पर सहभागिता की |

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