विश्‍वविद्यालय में ‘हिंदी लेखन कौशल : एक संवाद’ विषय पर राजभाषा कार्यशाला सम्पन्न


विश्‍वविद्यालय में ‘हिंदी लेखन कौशल : एक संवाद’ विषय पर राजभाषा कार्यशाला सम्पन्न

लेखन का अभ्‍यास व्‍यक्ति के बौद्धिक स्‍तर को परिष्‍कृत करता है : प्रो. आनंदप्रकाश त्रिपाठी

लेखन कौशल व्‍यक्ति की आत्‍म-अभिव्‍यक्ति की क्षमता का द्योतक है : संतोष सोहगौरा

गौर समिति कक्ष, नवीन प्रशासनिक भवन। 27 फरवरी, 2026।
विश्‍वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर के मार्गदर्शन में विश्‍वविद्यालय के राजभाषा प्रकोष्‍ठ द्वारा विश्‍वविद्यालय के अधिकारियों एवं कर्मचारियों हेतु आयोजित ‘हिंदी लेखन कौशल : एक संवाद’ विषयक एक दिवसीय हिंदी कार्यशाला उत्साहपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुई। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों के राजभाषा हिंदी के प्रति ज्ञान-विस्तार, व्यक्तित्व विकास, भाषा-संवर्धन तथा व्यावहारिक अनुभव को समृद्ध करना रहा।

कार्यक्रम में विषय-विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित डॉक्‍टर हरीसिंह गौर विश्‍वविद्यालय, सागर के पूर्व अधिष्‍ठाता एवं हिन्‍दी विभाग के पूर्व अध्‍यक्ष प्रो. आनंदप्रकाश त्रिपाठी ने अपने व्याख्यान में हिंदी लेखन की संरचना, विचारों की तार्किक अभिव्यक्ति, भाषा की शुद्धता एवं सृजनात्मकता के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और अनुभव की अभिव्यक्ति है। प्रभावी लेखन व्यक्ति के बौद्धिक स्तर को परिष्कृत करता है तथा उसके व्यक्तित्व को सशक्त बनाता है। उन्होंने उदाहरणों, संदर्भों और संवादात्मक पद्धति के माध्यम से बताया कि किस प्रकार नियमित अध्ययन, चिंतन और अभ्यास से भाषा पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार, समृद्ध शब्दावली, स्पष्ट विचार-प्रवाह और व्याकरणिक शुद्धता लेखन की आधारशिला हैं। लेखन प्रक्रिया में अनुशासन, संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकार भी उतने ही आवश्यक हैं।

कार्यशाला का विषय प्रवर्तन करते हूए कार्यक्रम के संयोजक तथा विश्‍वविद्यालय के संयुक्‍त कुलसचिव एवं राजभाषा अधिकारी श्री संतोष सोहगौरा ने कहा कि वर्तमान प्रतिस्पर्धी युग में प्रभावी लेखन कौशल व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण अंग है। भाषा व्यक्ति की पहचान और अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। उन्होंने बताया कि साहित्यिक लेखन एवं प्रशासनिक लेखन दोनों में बहुत अंतर होता है। एक ओर जहां साहित्यिक लेखन में लेखक अपने मनोभावों को व्‍यक्‍त करने हेतु पूर्ण स्‍वतंत्र होता है वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक लेखन में संक्षिप्‍तता, औपचारिकता एवं स्‍पष्‍टता होना आवश्‍यक होता है। हिन्‍दी भाषा की खूबियों पर बात करते हुए उन्‍होंने बताया कि हिन्‍दी का व्‍यवस्थित व्‍याकरण एवं समृद्ध शब्‍द संसार है जिसमें भारत की समस्‍त भाषाओं के शब्‍द समाहित हैं। उन्‍होंने बताया कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ प्रतिभागियों और युवा प्रतिभाओं को आत्मविश्वास प्रदान करती हैं तथा उनके अनुभव को व्यावहारिक दिशा देती हैं।

उक्‍त कार्यशाला में 50 से अधिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने सक्रिय सहभागिता की। कार्यशाला में सहायक कुलसचिव श्री राजकुमार पाल, श्रीमती ए.लक्ष्‍मी, श्रीमती ममता त्रिपाठी, सूचना विज्ञानी श्री दयानंदप्‍पा कोरी, अनुभाग अधिकारी श्री रोहित रघुवंशी सहित विभिन्‍न विभागों में कार्यरत अधिकारी एवं कर्मचारीगण उपस्थित रहे। इस दौरान प्रतिभागियों ने भी लेखन संबंधी जिज्ञासाएँ प्रस्तुत कीं तथा अपने अनुभव साझा किए। इस संवादात्मक वातावरण ने सीखने की प्रक्रिया को और अधिक जीवंत एवं सार्थक बनाया। प्रतिभागियों ने इसे ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक एवं व्यक्तित्व विकास की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी बताया। यह कार्यशाला हिंदी भाषा के प्रति नवचेतना एवं रचनात्मक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक सार्थक प्रयास सिद्ध हुई।

अंत में राजभाषा प्रकोष्‍ठ के उच्‍च श्रेणी लिपिक श्री विनोद रजक द्वारा धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ कार्यशाला का समापन हुआ। संचालन हिन्‍दी अनुवादक अभिषेक सक्‍सेना ने किया। विशेष सहयोग श्री राजेश सोनी एवं श्री संतोष लोढ़कर का रहा।

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