आस्था, विकास और समरसता का संगम” — बुद्ध जयंती पर गौरनगर में सामुदायिक मंगल भवन का भूमिपूजन, जनकल्याण की नई धारा प्रवाहित

आस्था, विकास और समरसता का संगम” — बुद्ध जयंती पर गौरनगर में सामुदायिक मंगल भवन का भूमिपूजन, जनकल्याण की नई धारा प्रवाहित

बुद्ध जयंती के पावन अवसर पर गौरनगर (महारानी लक्ष्मीबाई वार्ड क्र. 05) स्थित बुद्ध वाटिका में आयोजित भूमिपूजन कार्यक्रम केवल एक निर्माण कार्य की शुरुआत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक ऊर्जा और जनसरोकारों के समन्वय का प्रेरक उदाहरण बनकर उभरा। इस अवसर ने विकास और धर्म के उस संतुलित स्वरूप को सजीव किया, जिसकी कल्पना समाज को दिशा देने वाले महापुरुषों ने की थी।
कार्यक्रम में महाराष्ट्र से पधारीं परम वंदनीय धम्म चारिणी भिक्षुणी रूपनंदा जी की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन को विशेष आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। उनके सान्निध्य में सम्पन्न धम्म वंदना और मंगलाचरण ने वातावरण को शांति, करुणा और आत्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत कर दिया। उनका सन्देश केवल उपदेश नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और समाज को समरस बनाने की प्रेरणा था।
नरयावली विधायक इंजीनियर प्रदीप लारिया ने अत्यंत विनम्रता के साथ संत चरणों में नमन करते हुए यह स्पष्ट किया कि विकास केवल भौतिक संरचनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि उसमें सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार का समावेश आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सामुदायिक मंगल भवन का निर्माण क्षेत्र के लोगों के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक आयोजनों का केंद्र बनेगा—जहां संवाद, सहयोग और समरसता की नई परंपराएं विकसित होंगी।
नपाध्यक्ष मिहीलाल अहिरवार ने कहा कि यह भवन केवल ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि जनविश्वास और सहभागिता का प्रतीक होगा, जो आने वाले समय में समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करेगा।
बुद्ध वाटिका समिति के अध्यक्ष डॉ. कमलेश कुमार अहिरवार ने इस पहल को समाज के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताते हुए सभी जनप्रतिनिधियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह निर्माण कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए उपयोगी धरोहर सिद्ध होगा।
कार्यक्रम के दौरान जिस प्रकार जनप्रतिनिधि, संत और आमजन एक साथ उपस्थित होकर भूमिपूजन के साक्षी बने, वह इस बात का संकेत है कि जब आस्था और विकास साथ चलते हैं, तब समाज केवल आगे नहीं बढ़ता—बल्कि ऊँचाइयों को स्पर्श करता है।
यह आयोजन अपने आप में एक संदेश है—कि विकास तब सार्थक होता है, जब उसमें मानवता, संस्कार और सामूहिकता की भावना समाहित हो।

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