क्यों भगवान भी गाते हैं गुरु की महिमा?गुरु पूर्णिमा विशेष

क्यों भगवान भी गाते हैं गुरु की महिमा?
गुरु पूर्णिमा विशेष
“बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।”
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में गुरु के चरणों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि गुरु के चरणों की धूल अमृत के समान है, जो संसार रूपी रोग का नाश करती है और जीवन को ज्ञान, भक्ति तथा सद्मार्ग की ओर ले जाती है।
कर्मकांड एवं ज्योतिष विशेषज्ञ डॉ. अनिल दुबे वैदिक बताते हैं कि शास्त्रों में “गु” का अर्थ अंधकार या अज्ञान तथा “रु” का अर्थ उसका नाश करने वाला बताया गया है। अर्थात जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वही गुरु कहलाता है।
गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि वह चेतना है जो मनुष्य को धर्म, सत्य और आत्मबोध के मार्ग पर अग्रसर करती है। सद्गुरु शिष्य के भीतर छिपी दिव्य ज्योति को जागृत कर उसके जीवन का रूपांतरण करता है।
महर्षि वाल्मीकि ने भी श्रीराम के माध्यम से गुरु की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा भगवान से भी बढ़कर होनी चाहिए। भारतीय संत परंपरा में यह मान्यता रही है कि भगवान की प्राप्ति भी सद्गुरु की कृपा से ही संभव होती है।
संतों ने कहा है—
“राम कृष्ण सबसे बड़े, उनहूँ तो गुरु कीन्ह।
तीन लोक के वे धनी, गुरु आज्ञा आधीन॥”
भारतीय संस्कृति में गुरु की भूमिका केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक तक सीमित नहीं रही। उन्होंने समाज, राजनीति, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। रामायण में गुरु वशिष्ठ की सलाह के बिना राजा दशरथ के दरबार का कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लिया जाता था।
उपनिषदों में कहा गया है—
“यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।”
अर्थात जैसी भक्ति ईश्वर के प्रति आवश्यक है, वैसी ही गुरु के प्रति भी होनी चाहिए। गुरु की कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार संभव माना गया है।
इसी भावना को प्रसिद्ध श्लोक में व्यक्त किया गया है—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
इस श्लोक में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के स्वरूप के रूप में स्वीकार किया गया है। गुरु ब्रह्मा की तरह शिष्य का निर्माण करते हैं, विष्णु की तरह उसका पालन करते हैं और महेश की तरह उसके दोषों का नाश करते हैं।
संत कबीरदास ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा—
“हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर।”
अर्थात यदि भगवान भी रुष्ट हो जाएँ तो गुरु की शरण रक्षा कर सकती है, लेकिन यदि गुरु ही रुष्ट हो जाएँ तो कहीं भी आश्रय नहीं मिलता।
कबीर आगे कहते हैं—
“सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावणहार॥”
अर्थात सद्गुरु शिष्य की ज्ञान-दृष्टि खोलकर उसे परम सत्य का दर्शन कराते हैं। गुरु के बिना मनुष्य संसार की माया में उलझकर अपना वास्तविक लक्ष्य भूल जाता है।
गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अपने जीवन में ज्ञान, संस्कार और सत्य का मार्ग दिखाने वाले गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान माता-पिता और देवताओं के समान पूजनीय माना गया है। यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी गुरु की महिमा का गुणगान करते हैं।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर समस्त गुरुजनों को सादर प्रणाम।
— डॉ. अनिल दुबे वैदिक
कर्मकांड एवं ज्योतिष विशेषज्ञ, देवरी (बिछुआ)
मो.: 9936443138

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