
अविराज सिंह ने पुराणों में वर्णित भगवान विष्णु के चार अवतारों के जन्म का उद्देश्य बताया
ढाबरी में श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ एवं शिवार्चन कार्यक्रम में शामिल हुए
बांदरी। युवा नेता अविराज सिंह ग्राम ढाबरी में माखन सिंह और राजेंद्र यादव द्वारा आयोजित संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञानयज्ञ एवं शिवार्चन के आयोजन में शामिल हुए। उन्होंने कथावाचक पं श्रीधर गौतम जी महाराज की व्यास पीठ की आराधना की और उपस्थित श्रद्धालुओं को कंठस्थ सस्वर शिवतांडव स्तोत्र सुनाया।
इस अवसर पर अपने संबोधन में युवा नेता अविराज सिंह ने उपस्थित श्रद्धालुओं को पौराणिक आख्यान सुनाते हुए कहा कि भगवान विष्णु के चार अवतारों का जन्म क्यों हुआ? भगवान विष्णु ने चार अवतार क्यों लिया, इसकी व्याख्या पुराणों और श्रीमद्भागवत में की गई है। भगवान विष्णु ने श्री नरसिम्हा अवतार,श्रीवराह अवतार, भगवान श्री राम और श्री कृष्ण अवतार क्यों लिया, इसकी व्याख्या पुराणों में की गई है। इसको वर्णित किया गया है।
उन्होंने कहा कि ब्रह्मा जी ने चार कुमारों की रचना की। वे चार कुमार संत भी थे और उन बाल संतों के मन में ये भावना आई कि वैकुंठ जाए और वैकुंठ जाकर भगवान विष्णु के तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु के दर्शन करें। जब वैकुंठ के द्वार पर पहुंचे तो वैकुंठ के द्वार पर उनकी भेंट वैकुंठ द्वार के दो द्वारपाल जय और विजय से हुई। चारों बालकों ने उनसे आग्रह किया हम चार संत भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहते हैं तो विष्णु जी के द्वारपालों ने उन्हें दर्शन करने की आज्ञा नहीं दी। चारों बार संत क्रोधित हो गए और क्रोधित होकर उन्होंने जय और विजय को श्राप दिया कि अब आप धरती पर जन्म लोगे तब आपको भगवान विष्णु जी से दूर जाना होगा। द्वारपाल जय और विजय श्राप से चिंतित हो गए। उन्होंने विष्णु जी से आग्रह किया, प्रभु हमारी श्राप से रक्षा करें। भगवान विष्णु प्रकट हुए और कहा कि मैं इनका श्राप तो रोक नहीं सकता, धरती पर मैं सात जनम आपको मेरे मित्र के रूप में दे सकता हूँ या तीन जनम आपको मेरे शत्रु के रूप में दे सकता हूँ।
उन्होंने बताया कि जय और विजय ने भगवान विष्णु से उनके शत्रु के रूप में तीन जन्म मांगे। विष्णु जी ने पूछा कि शत्रु के रूप में क्यों ? जय और विजय ने कहा अगर आप हमें तीन जनम अपने शत्रु के रूप में दोगे तो फिर ये निश्चित है की हमारी मृत्यु भी आपके हाथों होगी। इसलिए हम चाहते हैं तीन जनम हमें आपके शत्रु के रूप में दे दीजिए। फिर सतयुग में जय और विजय का जनम हुआ हिरन्य अक्ष और हिरन्य कश्यप के रूप में। हिरन्य अक्ष का वध विष्णु जी ने अवतार लेकर वराह रूप में किया। हिरन्य कश्यप का वध उन्होंने नरसिंह अवतार में किया। त्रेता में जय और विजय को जन्म मिला रावण और कुंभ कर्ण के रूप में तब विष्णु जी ने भगवान श्री राम के रूप में रावण और कुंभ कर्ण का वध किया। भगवान श्री कृष्ण के रूप में शिशुपाल और दंत वक्र का शव किया।
अविराज सिंह ने कहा कि श्रावण मास में शिवजी की भक्ति का सबसे ज्यादा महत्त्व है। इसलिए आज आप सभी को मैं शिवतांडव स्तोत्र भी सुनाऊंगा। शिव महापुराण में ये वर्णित है भगवान शिवजी को सबसे प्रिय शिव स्तोत्र है। जब भी शिव तांडव स्तोत्र होता है तो शिवजी उसे सुनकर तांडव नृत्य करते हैं और जो भी शिव तांडव स्तोत्र को सुनता है उसे शिवजी समृद्धि, ऐश्वर्य और संपन्नता प्रदान करते हैं।उसे बहुत ऊर्जा और शक्ति प्रदान करते हैं।











