सत्संग ंऔर गुरूकृपा आध्यात्मिक उन्नति का आधार: मां कनकेश्वरी।

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सत्संग ंऔर गुरूकृपा आध्यात्मिक उन्नति का आधार: मां कनकेश्वर

महलगांव करौलीमाता मंदिर में श्रीमद्देवी कथा का छंठवा दिन

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ग्वालियर। सत्संग ंऔर गुरूकृपा ही आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। पवित्रता बनाए रखकर यदि जीवन में गुरूकृपा से पुरूषार्थ करेंगे तो जीवन में सफलता निश्चित है। यह विचार अग्नि अखाडे की महामंडलेश्वर मां कनकेश्वरी देवी ने श्रीमद्देवी कथा के छंठवे दिन महलगांव स्थित करौलीमाता एवं कुंवर महाराज प्रागंण में व्यक्त कि ए। इस मौके पर रतनगढ़ माता के महंत राजेंद्र कटारे महामंडलेश्वर कपिल मुनि महाराज, महंत शंभूदयाल शर्मा, महंत दिलीप शर्मा, देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर रामू, अशोक जादौन गिर्राज शर्मा सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे। गुरूवार को महिषासुर मर्दिनी की कथा होगी।

उन्होंने कहा कि जब हम गुरू के दिए हुए कुछ निश्चत मंत्रों से समुरिन करते हैं जो उसे साधना क हते हैं, लेकिन साधना का अर्थ यह नहीं कि हमें सिद्धि प्राप्त हो जाएंगी। साधना हमारे अधोगति नहीं होने देती है। उन्होंने कहा कि धर्म से जुड़े लोग गृहस्थों से ज्यादा पाखंडी होते हैं, ऐसे पाखंडियों से बचकर रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि एक तपस्वी में प्रथ्वी के समस्त राजा इकट्ठे हो जाएं, एक तपस्वी की साधना के बराबर उनमें बल नहीं हो सकता है ै,लेकिन फिर भी हमें पद का यथोचित सम्मान करना चाहिए।

गौमाता जहां रहती है,वहीं दरिद्रता नहीं रहती….

गौमाता की महिमा का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि गौमाता जहां रहती है,वहीं दरिद्रता नहीं रहती है। गाय की घी दूध और दही से ही पंचामृत और भगवान का भोग लगता है। गाय प्रकृति की प्रसन्नता का आधार है, ये पशु नहीं स्वयं देवी जगदम्बा का रूप है। जिस स्वरूप को हम अपनी आस्था का आधार मानते हैं, उसका कोई मूल्य नहीं होता है।

देवी की कृपा पर संदेह मत करो…..

उन्होंने कहा कि हम जब बार बार यह कहते हैं कि प्रभु कृपा करो, इसका आशय हम उसकी कृपा पर संदेह कर रहे हैं।। आपकी कुलदेवी आप पर सदा कृपा करती है, इसलिए उसकी कृपा पर कभी संदेह मत करो। शस्त्र आपको कुछ हद तक बचा सकता है लेकिन जहां शास्त्रों की क्षमता समाप्त हो जाती है,वहां साधना काम आती है।

उन्होंने जनप्रतिनिधियों से कहा कि देवी का स्वरूप मानकर जनता की सेवा करें। सिर्फ नवरात्रि में मां के स्वरूप की आराधना करें। यदि नौ दिन व्रत न रख सकेें तो सप्तमी, अष्टमी और नवमी को देवी का व्रत जरूर करें। उन्होंने बताया कि गृह तो मौसम की तरह सुख देते हैं, गृहों का संतुलन रखें लेकिन देवी की उपासना करते रहें, क्योंकि जो सुख देवी देती हैं वो गृह नहीं दे सकते हैं। देवी की उपासना के लिए जल संपूर्ण सामग्री है।

एक लोटा जल में प्रकट हो जाती हैं देवी…..

एक लोटा जल भरकर देवी का आह्वान करें देवी उसमें प्रकट हो जाएंगी। उन्होंने कहा कि जिस तरह त्योहारों पर हम अपने लिए खरीददारी करते हैं वैसे ही अपने आराध्य के श्रंृगार के लिए वस्तुएं खरीदें। देवी प्रसन्न होकर जब हमारी बुद्धि में विद्यमान हो जाएंगी,तो हमारे निर्णय के परिणाम सही आने लगेंगे। उन्होंने बताया कि अवतारों की शक्ति का आधार देवीशक्ति है। नारददी ने श्रीराम को दस महाविद्याओं मे से एक तारामाईकी आराधना बताई। इस तरह जब हम श्रीताराम भजते हैं तो राम प्रसन्न होते हैं, क्योंंकि उनके साथ उनकी आराध्य देवी तारा की भी उपासना हो जाती है।

देवीकृपा से महीनों अन्नजल से बगैर रहीं सीता…..

उन्होंने बताया कि राम द्वारा की गई देवी उपासना के परिणाम स्वरूप रावण चाहकर भी सीता को छू नहीं पाया और वह बिना अन्न जल के महीनों तक सुरक्षित रहीं। उन्होंने बताया कि अष्टमी की रात देवी राम के समक्ष प्रकट हुई थीं। अवतारों ने भी शक्ति की आराधना की है। अष्टमी को आज भी कुछ क्षण के लिए ही सही,लेकिन एक बार देवी का प्रकाट्य जरूर होता है। कृष्णावतार से पहले भी देवी कार्यरत थीं। वो बिजली बनकर कंस के दरबाह मेें आईं। देवी ने कृष्ण को संतान सुख प्रदान करने का वरदान दिया, जिसकी वजह से गोपाल सहस्त्रनाम का जप करने से संतान सुख प्राप्त हो जाता है।

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