
मनुष्य अपने धन, पद या वैभव से नहीं बल्कि ज्ञान से महान बनता है – अविराज सिंह
खुरई। जब भी कहीं श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन होता है, वह स्थान सदा के लिए पवित्र हो जाता है, क्योंकि कथा के माध्यम से हम श्रीमद्भागवत रूपी अमृत का रस पान करते हैं और कृष्ण रूपी ज्ञान को समझते हैं। भगवान श्री कृष्ण के जीवन से मानव धैर्य, धर्म, संयम और ज्ञान का वास्तविक महत्व समझता है। यह उद्बोधन युवा नेता अविराज सिंह ने समस्त महिला मंडल द्वारा टैगोर वार्ड संतोषी माता मंदिर खुरई और ग्राम गमिरिया में आयोजित श्रीमद्भगवत कथा में दिये।
अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण का यही उपदेश है कि संसार का सबसे अनमोल धन ज्ञान है। उन्होंने अपने जीवन से यह उदाहरण भी दिया कि जब उनके गुरुदेव द्वारका पधारे थे, तब श्री कृष्ण ने माता रुक्मणी के साथ स्वयं रथ को खींचकर विनम्रता और ज्ञान का महत्व स्थापित किया। उनका मानना था कि मनुष्य अपने धन, पद या वैभव से बड़ा नहीं होता, बल्कि वह अपने ज्ञान से महान और पूजनीय बनता है।
अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्री कृष्ण से हमें यह भी सीखने को मिलता है कि जो हमसे बड़े हैं ,चाहे वे किसी भी पक्ष में क्यों न हों ,उनका सम्मान करना चाहिए। महाभारत युद्ध से पूर्व भी श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को प्रेरित किया था कि भले ही भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य कौरवों के पक्ष में हैं, परंतु युद्ध से पहले उनके चरणों में जाकर आशीर्वाद लेना चाहिए। श्री कृष्ण का संदेश है कि भक्ति से दुखों का नाश होता है और यही संदेश श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित है। आज के समय में युवाओं को यह समझना आवश्यक है कि कृष्ण का मूल संदेश यह है कि शरीर एक रथ के समान है, इन्द्रियाँ उसके आगे लगाए गए घोड़े हैं और मन उस रथ का सारथी है। यदि मन और इन्द्रियाँ संयमित न हों तो जीवन रूपी रथ पलट जाता है। इसलिए कृष्ण के संदेशों को पढ़ना, समझना और जीवन में उतारना ही मोक्ष का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन ग्राम गमिरिया बुजुर्ग, खुरई में श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जा रहा है। कृष्ण ने अपने जीवन से यह सिखाया कि संघर्ष मनुष्य को चुभता अवश्य है, पर वही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण भी करता है। स्वयं श्री कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ, जन्म के तुरंत बाद उन्हें यमुना पार कर गोकुल ले जाया गया, बाल्यावस्था में उन्होंने अनेक राक्षसों का वध किया, और फिर शिक्षा प्राप्त करने के लिए उज्जैन गए। महाभारत का युद्ध भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण और संघर्षपूर्ण अध्याय था। परंतु इन सबके माध्यम से यह शिक्षा मिलती है कि विपत्ति ही मनुष्य को मजबूत बनाती है और अधर्म से अर्जित धन अंततः व्यक्ति को राक्षस बना देता है।
उन्होंने कहा कि जिस भी प्रांगण में श्रीमद्भागवत कथा होती है, वह स्थान सदैव पवित्र हो जाता है। कथा के माध्यम से मनुष्य काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे दोषों से मुक्त होने का मार्ग प्राप्त करता है। कथा स्थल पर परम पूज्य पं. मनीष शास्त्री जी महाराज के सानिध्य में श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित हो रहे हैं। कथा आयोजन में कृष्ण गोपाल विश्वकर्मा, भगवानदास विश्वकर्मा, मुन्नालाल विश्वकर्मा, नेतराम विश्वकर्मा, जगदीश विश्वकर्मा, श्यामलाल विश्वकर्मा, वृंदावन विश्वकर्मा, रविन्द्र सिंह राजा भाई सहित अनेक श्रद्धालु अपनी सेवाएँ दे रहे हैं।
मीडिया कार्यालय
दिनांक-12.12.2025











