नेतृत्व आदेश से नहीं, आचरण और कर्तव्य से स्थापित होता है-अविराज सिंह

नेतृत्व आदेश से नहीं, आचरण और कर्तव्य से स्थापित होता है-अविराज सिंह

मालथौन। युवा नेता अविराज सिंह ने कहा कि कलियुग में जब संसार स्वार्थ, छल-कपट और भोग-विलास की ओर बढ़ रहा है, ऐसे समय में भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के आदर्श ही मानव जीवन को सही दिशा दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि श्रीराम का जीवन त्याग, मर्यादा और कर्तव्य का प्रतीक है, जबकि श्रीकृष्ण का जीवन ज्ञान, नीति और धर्म का संदेश देता है।

अविराज सिंह ने कहा कि यह धार्मिक आयोजन जनमानस में आध्यात्मिक चेतना और संस्कारों का संदेश दे रहा है। आयोजन समस्त ग्रामवासी, क्षेत्रवासी एवं जनसामान्य के सहयोग से संपन्न हो रहा है। ग्राम पठारी में अविराज सिंह नें कहा तथा 32 परिवारों को पंखे वितरित किये। घरों में सामग्री वितरण के दौरान ग्रामीणों में विशेष उत्साह देखने को मिला।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार फूल को खिलने के लिए सूर्य की किरण आवश्यक होती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन को सफल बनाने के लिए प्रभु श्रीराम की शरण आवश्यक है। समुद्र मंथन के समय भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था, किंतु उनके हृदय में श्रीराम का स्मरण न के कारण वह विष भी “विश्राम” बन गया। उन्होंने कहा कि जिस जीवन में “राम” नहीं है, उसके लिए सब कुछ विष के समान है, लेकिन जैसे ही “राम” का स्मरण जुड़ जाता है, वही जीवन शांति और विश्राम का मार्ग बन जाता है। उन्होंने कहा कि “राम भगति मनि उर बस जाकें, दुःख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥” अर्थात जिसके हृदय में प्रभु श्रीराम की भक्ति बस जाती है, उसके जीवन में दुःख का कोई स्थान नहीं रहता।

अविराज सिंह ने कहा कि महल मनुष्य को विलासी बनाता है, जबकि वनवास उसे तपस्वी और विश्वविजेता बनाता है। भगवान श्रीराम का वास्तविक साम्राज्य दंडकारण्य में स्थापित हुआ था। समय सबसे बड़ा शिल्पकार है, जिसने वनवास की छेनी से श्रीराम को तराशकर मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया। उन्होंने कहा कि रावण अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा था, जबकि श्रीराम कर्तव्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे और इतिहास सदैव कर्तव्य की विजय को ही स्मरण रखता है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम का चरित्र यह सिखाता है कि नेतृत्व आदेशों से नहीं, बल्कि आचरण और आदर्शों से स्थापित होता है। कलियुग अराजकता का युग है, जहां आदर्शों से अधिक धन को महत्व दिया जाएगा। जल के सागर होंगे, लेकिन प्यास नहीं बुझेगी, अन्न के भंडार होंगे, लेकिन भूख समाप्त नहीं होगी। हर कदम पर छल बढ़ेगा और संसार स्वार्थ में डूबता चला जाएगा। ऐसी परिस्थिति में केवल प्रभु नाम का जाप ही मनुष्य को आगे बढ़ाने वाला मार्ग सिद्ध होगा।

अविराज सिंह ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से मानव जीवन को कर्म, ज्ञान और भक्ति का महान संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति बाहर से भक्ति का प्रदर्शन करता है, लेकिन भीतर विषय-वासनाओं में डूबा रहता है, वह भक्त नहीं बल्कि ढोंगी होता है। संघर्ष उसी व्यक्ति को चुनता है, जिसमें लड़ने की क्षमता होती है। यदि किस्मत रूठ जाए तो निराश नहीं होना चाहिए, क्योंकि किस्मत लिखने वाला भगवान कभी साथ नहीं छोड़ता।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का बाल स्वरूप युवाओं को आनंद, साहस, परिश्रम, भक्ति और जिम्मेदारी का संतुलन सिखाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में शस्त्र उठाए बिना भी अपनी नीति और धर्म के मार्ग से विजय सुनिश्चित की। जब जीवन का रथ डगमगाने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण का सारथ्य ही मनुष्य को विजय और शांति की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन उसके कर्मों के आधार पर निर्मित होता है।

अविराज सिंह ने कहा कि पूतना वध का प्रसंग यह सिखाता है कि सत्य केवल रक्षा ही नहीं करता, बल्कि बुराई का अंत कर उसे परिवर्तित भी कर देता है। ज्ञान से विवेक प्राप्त होता है, कर्म से प्रगति होती है और भक्ति से जीवन में शांति आती है। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन यह संदेश देता है कि सच्चा नेता वही है, जो प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश देखे, चाहे वह गोप हो, ग्वाला हो अथवा राजा।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं और उनके चरित्र में वैराग्य योग, ज्ञान योग, धर्म योग, कर्म योग और ऐश्वर्य योग का अद्भुत समावेश है। पंचतत्वों में समस्त देवशक्तियों का वास है। आकाश में भगवान विष्णु एवं सूर्यदेव, वायु में पवनदेव, अग्नि में सूर्य नारायण एवं अग्निदेव, जल में भगवान शिव एवं वरुण देव तथा पृथ्वी में भगवान गणेश और आदिशक्ति का निवास माना गया है।

अविराज सिंह ने कहा कि जिस प्रकार गंगाजी सभी नदियों में श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पार्थिव शिवलिंग सभी लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। व्रतों में शिवरात्रि श्रेष्ठ है और शक्तियों में शिवशक्ति का सर्वोच्च स्थान है। शिव ही सत्य हैं, शिव अनंत हैं, शिव ओंकार हैं, शिव ब्रह्म हैं और शिव ही भक्ति तथा शक्ति के स्वरूप हैं।

उन्होंने कहा कि भगवान हनुमान की विनम्रता मानव जीवन के लिए महान प्रेरणा है। लंका पहुंचने जैसे अद्भुत पराक्रम के बाद भी उन्होंने स्वयं को केवल प्रभु का सेवक माना। अर्जुन जैसा महान योद्धा भी कुरुक्षेत्र में विचलित हो गया था, जबकि उसके साथ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे, लेकिन हनुमानजी ने अकेले रहकर भी अद्भुत साहस और आत्मबल का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि सत्संग के बिना मनुष्य का जीवन भटक सकता है और शिवलिंग के पूजन से समस्त दुःखों का नाश होता है।

मीडिया कार्यालय
दिनांक : 22.05.2026

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