भारतीय ज्ञान परम्परा में भाषा, साहित्य एवं संस्कृति विषय दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल समापन

भारतीय ज्ञान परम्परा में भाषा, साहित्य एवं संस्कृति विषय दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल समापन

जिस प्रतिभा के बल पर भूत, भविष्य और वर्तमान को एकाकार कर सकते हैं वही भारतीय ज्ञान परम्परा है: प्रो.बाल कृष्ण शर्मा

सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) के संस्कृत विभाग द्वारा रंगनाथन भवन में “भारतीय ज्ञान परम्परा में भाषा, साहित्य एवं संस्कृति ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य एवं सार्थक आयोजन किया गया। संगोष्ठी के समापन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, पुष्प अर्चन एव सरस्वती वंदना के साथ किया गया। आयोजन समिति के द्वारा अतिथियों का सत्कार किया गया ।
समापन सत्र के इस अवसर पर मंच पर विशिष्ट अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय की कुलानुशासक प्रो.चंदा बेन, सारस्वत अतिथि के रूप में प्रो. दिवाकर राजपूत निदेशक, अकादमिक मामले, मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. बालकृष्ण शर्मा शासकीय महाविद्यालय ग्वालियर उपस्थित रहे । राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता भाषा अध्ययनशाला की अधिष्ठाता प्रो.रश्मि सिंह ने की । मंच का संचालन संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ. शशि कुमार सिंह ने किया दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सार संक्षेप में सहायक आचार्य संस्कृत विभाग एवं संगोष्ठी के आयोजन सचिव डॉ. रामहेत गौतम ने प्रस्तुत किया ।
विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो.चंदा बेन, (कुलानुशासक) ने खा भारतीय ज्ञान परम्परा में जो श्रेष्ठ है उसकी चर्चा हमरे वेड वेदांगों में की गयी है । जब हम पाली ,प्राकृत की चर्चा करते हैं, तो हमें बुद्ध की भी चर्चा करनी होगी । उनसे हमें करुणा, दया और समानता सीखनी होगी।आज का परिवेश डगमगा रहा है भक्ति कल में जब मुगलों का शासन था । तब निर्गुण और सगुण दोनों विचारको के लिए उपासना के द्वार खुले थे । आचार्य रामचंद्र शुक्ल को आकाश धर्मागुरु कहते है उनके शिष्य निर्गुण और सगुण परम्परा के भी थे । भारतीय ज्ञान परम्परा में सभी की बात होनी चाहिए । आज चार्वाक भी हमें अपनी जीवन शैली में दिखाई देता है । आज हमें उस प्रकार के आचार्य और धर्म की जरुरत है जो हमें एक साथ ला सके । हम समाज को सही रूप में स्थापित कर सकें ।
सारस्वत आतिथि के रूप में उपस्थित प्रो.दिवाकर सिंह राजपूत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा प्रज्ञा प्रवाह पर निर्भर करती है क्योंकि भारतीय ज्ञान की आत्मा प्रज्ञा में निहित है प्रज्ञा व्यक्तित्व का निर्माण करने को एक दिशा देती है भारतीय ज्ञान में जब हम चिन्तन करते है तो शब्द चाहिए । संस्कृत भाषा ही नही है बल्कि व्यक्तित्व निर्माण को भी गति और दिशा देती है । साहित्य के रूप में क्या हो ,क्यों हो ,कैसा हो, चाहे वे वाचिक हों या कायिक, सबका सरक्षण भाषा करती है । संस्कृति उसका अनुसरण करती है । विचार संगोष्ठी में हमने क्या पाया, क्या किया, यह पता चलता है चलने, बोलने, खाने, लिखने, पढने से ,यही हम सीखते है यही संस्कृति है ।
प्रो.बाल कृष्ण शर्मा ने अपने वक्तब्य में कहा कि परम्परा अपने आप में इस बात की सूचक है की अदि से लेकर वर्तमान तक चलना है । हम कार्य से भी अपनी निष्ण प्रकट कर सकते है यही जीवन की परम्परा है । हमारे यहाँ पुनर्जन्म की अवधारणा है हमें जो मिलता है वह पूर्व जन्म का प्रतिफल है । यहाँ एक जन्म की कथा नही की जाती है बल्कि कई जन्मों की कथा की जाती है । यही भारतीय परम्परा है । जिस प्रतिभा के बल पर भूत ,भविष्य और वर्तमान को एकाकार कर सकते हैं वही भारतीय ज्ञान परम्परा है । व्यक्तिनिष्ठ और वस्तुनिष्ठ को एक रूप में ज्ञान परम्परा में समाहित करते हैं । जब वेदों से लेकर आज तक के साहित्य की बात की जाती है तो यह वस्तुनिष्ठ है और ऋषि से लेकर वर्तमान तक के आचार्य आप्त पुरुषों की बात व्यक्तिनिष्ठ हैं । जो दिखाई नहीं दे रहा हो, मुक्त हो, वह मंत्र है । रहस्यों को प्रत्यक्ष करने वाला वह ऋषि है । मंत्र विज्ञान है । भाषा, साहित्य, संस्कृति का क्रम सुविचारित है । भाषा बिना किसी भेदभाव के हर बच्चे को मिल जाती है यही हमारी सबसे अच्छी निधि है । भाषा हमें निरायास मिलती है । बालक जन्म लेता है तो भाषा ही हमें पदार्पण करती है । जब भाषा को सुंदर बनाते हैं तो वह साहित्य की ओर कदम रखकर प्रविष्ट हो जाती है । मन बुद्धि अहंकार से जो कार्य करते हैं वह संस्कृति है । हमें अतीत से वर्तमान तक जोड़ने का काम भाषा साहित्य और संस्कृति करती है । मल्लिनाथ ने कहा है न अधिक बोलना है न कम बोलना है । व्यक्तिनिष्ठ पांच शब्द हैं ऋषि, महर्षि, मुनि ,आचार्य , आप्त पुरुष इन्हीं पांच शब्दों में भारतीय ज्ञान परंपरा समाहित है । भारतीय ज्ञान परंपरा की कोई सीमा नहीं है आदि विहारों के माध्यम से अपने बात सभ के समक्ष रखी ।
डॉ रामरतन पांडेय पुरातन छात्र ने विभाग की परंपरा पर संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्व है संस्कृत विभाग की गरिमा अत्यंत महत्वपूर्ण रही है डॉक्टर प्रेमानंद मिश्र ने ज्ञान विज्ञान का वास्तविक स्रोत भारतीय ज्ञान परंपरा को बताया । उन्होंने दिव्य जीवन शैली और समग्र ब्रह्म ज्ञान की बात की ,पुरुषार्थ और चार आश्रम की बात की l
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के निदेशक प्रोफेसर राजेंद्र यादव ने भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में कहा की शिल्पकार, चित्रकार बढ़ई,आदि का स्थान क्या है । क्या भारतीय ज्ञान परंपरा में आज इनकी बात की जा रही है । हम किस नजर से देखते हैं इस पर भी हमें बात करनी है अंत में उन्होंने बद्रीनारायण की एक कविता प्रेम पत्र का उल्लेख करते हुए कहा प्रेत आएगा प्रेम को निकाल ले जाएगा किताब के पन्ने से ।
अंत में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर रश्मि सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा बहुआयामी है जो सभी के लिए ग्रहणी और ग्राहय भी है । ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कैसे पहुंचना है यह मौखिक रूप से चलता रहता है । इस राष्ट्रीय संगोष्ठी की संयोजिका डॉक्टर किरण आर्य ने सभी का आभार ज्ञापन प्रस्तुत किया । इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन राष्ट्रीय गीत और वंदे मातरम के साथ किया गया । इस अवसर पर सभी विद्वान आचार्य गण, अधिकारी गण, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे ।

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