पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है” — नितिन त्रिपाठी

पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है” — नितिन त्रिपाठी
विश्वविद्यालय के संचार एवं पत्रकारिता विभाग में मीडिया संवाद का आयोजन
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के संचार एवं पत्रकारिता विभाग में कर्पूर चंद्र कुलिश की जन्मशती के उपलक्ष्य में राजस्थान पत्रिका के संयुक्त तत्वावधान में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार जायसवाल के स्वागत उद्बोधन से हुई, जिसमें उन्होंने कुलिश जी की निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने बताया कि पत्रिका की स्थापना इस विचार के साथ हुई कि अखबार ऐसा होना चाहिए जो किसी भी प्रकार का समझौता न करे। कुलिश जी ने अपने जीवन में यह सिद्ध किया कि अखबार का स्वार्थ समाज होना चाहिए, न कि सत्ता या सरकार। जब उनकी एक महत्वपूर्ण खबर को रोका गया, तब उन्होंने मात्र 500 रुपये की पूंजी से पत्रिका समूह की नींव रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनहित और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता है, चाहे इसके लिए सरकारों के दबाव का सामना ही क्यों न करना पड़े। उनके विचारों में हर पेशे के इतिहास को जानना और अपने मूल से जुड़े रहना अत्यंत आवश्यक है।

वक्ताओं ने पत्रिका के विभिन्न अभियानों का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार इस संस्थान ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई और कई बार आर्थिक नुकसान उठाने के बावजूद अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। वर्ष 2008 में मध्यप्रदेश में चलाया गया “जमीन का दर्द” अभियान इसका प्रमुख उदाहरण है। पत्रिका ने हमेशा अडिग रहकर निर्भय और निष्पक्ष पत्रकारिता की मिसाल कायम की।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता पत्रिका के स्थानीय संपादक नितिन त्रिपाठी थे। उन्होंने अपने 30 वर्षों के अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि वे तीन राज्यों में दस संस्करणों के संपादक रह चुके हैं और बस्तर के जगरगुंडा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी कार्य कर चुके हैं, जो आज माओवादी प्रभाव से मुक्त हो चुका है। उन्होंने बस्तर की सांस्कृतिक विशेषताओं को भी साझा किया और कहा कि पत्रकारिता का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है।

विशिष्ट वक्ता अभिलाष ने बताया कि वे पिछले दस वर्षों से पत्रिका में चीफ रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि इस संस्थान में जन सरोकार से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी जाती है। संपादकीय में वाल्टेयर के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े विचारों को ध्येय वाक्य के रूप में प्रकाशित किया जाता है। उन्होंने वर्तमान समय में फेक न्यूज की चुनौती पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अखबार आज भी एक विश्वसनीय स्रोत बना हुआ है।

पत्रकार रेशु जैन ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने दस वर्षों के करियर में सागर में एक महिला पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने कहा कि पत्रिका ने महिलाओं को अपनी आवाज उठाने का मंच दिया। इसके अंतर्गत “बिटिया”, कंबल वितरण, पौधारोपण जैसे सामाजिक अभियानों के साथ-साथ शहर के मुद्दों और लाइफस्टाइल से जुड़े कॉलम भी संचालित किए जाते हैं।

टीचिंग लर्निंग सेंटर से जुड़े आमंत्रित वक्ता डॉ. संजय शर्मा ने बताया कि राजस्थान पत्रिका का अध्ययन करने से विद्यार्थियों को इतिहास विषय में बेहतर समझ मिलती है। उन्होंने पत्रिका की 70 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसने समाज के हर वर्ग—बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों—के लिए महत्वपूर्ण सामग्री प्रदान की है। राजस्थान जैसे क्षेत्रों में जहां अखबार कभी विलासिता माने जाते थे, वहां पत्रिका ने एक अखबार के माध्यम से पूरे गांव को जोड़ने का कार्य किया। इसने बाल विवाह और सामंती प्रथाओं के खिलाफ जागरूकता फैलाकर सामाजिक बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने आगे बताया कि पत्रिका ने पानी के संकट, रेगिस्तान में कृषि, शिक्षा, साक्षरता और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर निरंतर कार्य किया। “नींव” कार्यक्रम के माध्यम से लाखों लोगों को शिक्षा से जोड़ा गया, जबकि “आज की खबर” कार्यक्रम के तहत स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाए गए। “अमृत जलम” अभियान के तहत पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया गया और “जन प्रहरी” अभियान ने नागरिक पत्रकारिता को बढ़ावा दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम दीक्षित ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि शब्दों की अपनी कीमत होती है और एक पत्रकार को ऐसे शब्दों का चयन करना चाहिए जो सीधे व्यक्ति की आत्मा को स्पर्श करें। उन्होंने कहा कि संक्षिप्त और प्रभावी लेखन एक महत्वपूर्ण कौशल है और सीखने की प्रक्रिया एक पत्रकार के लिए कभी समाप्त नहीं होती।

कार्यक्रम के समापन सत्र में डॉ. अलीम अहमद खान ने कुलिश जी के व्यक्तित्व और योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि आजादी से पूर्व की पत्रकारिता अनेक चुनौतियों से भरी थी, लेकिन कुलिश जी ने अपने साहस और प्रतिबद्धता से एक नई दिशा दी। उन्होंने स्थानीय समाचारों को प्राथमिकता देकर पत्रकारिता में विविधता लाई और यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र में सत्ता का विरोध आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि संवाद सत्रों के माध्यम से पत्रकारों के अनुभव से वह ज्ञान प्राप्त होता है जो पुस्तकों से नहीं सीखा जा सकता।

कार्यक्रम का संचालन विभाग के शोधार्थी दिलीप चौरसिया ने किया। धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी अंशिका तिवारी द्वारा प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में पत्रिका समूह के कई वरिष्ठ संवाददाता, पत्रकार, स्नातक, स्नातकोत्तर के विद्यार्थी एवं शोधार्थी मौजूद थे. यह आयोजन न केवल पत्रकारिता के मूल्यों को समझने का माध्यम बना, बल्कि विद्यार्थियों को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति भी जागरूक करने में सफल रहा।

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