भूमिहीन कृषि श्रमिकों के सशक्तिकरण पर राष्ट्रीय चिंतन बैठक आयोजित

भूमिहीन कृषि श्रमिकों के सशक्तिकरण पर राष्ट्रीय चिंतन बैठक आयोजित

सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में सामाजिक समरसता मंच के सहयोग से भूमिहीन कृषि श्रमिकों के व्यापक सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक सशक्तिकरण के संदर्भ में एक दिवसीय राष्ट्रीय चिंतन बैठक का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नीति विशेषज्ञों, समुदाय के सदस्यों एवं किसानों ने भाग लिया। कार्यक्रम के प्रारंभ में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर यशवंत सिंह ठाकुर ने अपने स्वागत उद्बोधन में जल संकट के समाधान खोजने तथा भूमिहीन कृषि श्रमिकों के लिए ठोस नीति तैयार करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि इस चिंतन बैठक का प्रमुख उद्देश्य भूमिहीन श्रमिकों की समस्याओं एवं चुनौतियों की पहचान करना, सामाजिक सुरक्षा एवं सामाजिक अधिकारों की मांग को मजबूत करना तथा विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय स्थापित करना है।
विशिष्ट अतिथि पूर्व आईएएस  बी. आर. नायडू  ने कहा कि भूमिहीन कृषि श्रमिकों की आय अत्यंत अनिश्चित होती है, जिसके कारण वे ऋण और अन्य आर्थिक कठिनाइयों में फंस जाते हैं। इसीलिए आज जब हम समावेशिता की बात करते हैं, तब यह आवश्यक है कि इस वर्ग को केंद्र में रखा जाए। उन्होंने कहा कि कौशल विकास योजनाओं के माध्यम से उन्हें जागरूक करना होगा। केवल योजना बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाना भी आवश्यक है। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि भूमिहीन कृषि श्रमिकों को सहानुभूति नहीं, बल्कि सशक्तिकरण प्रदान किया जाए।
मुख्य अतिथि पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री,भारत सरकार, नई दिल्ली, प्रोफेसर संजय पासवान ने अपने उद्बोधन में समरसता का अर्थ समझाते हुए कहा कि भूमिहीन परिवारों को थोड़ी-बहुत भूमि उपलब्ध कराने के प्रयास होने चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सब यह संकल्प लें कि कोई भी व्यक्ति भूमिहीन न रहे। साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें उन्नयन, शिक्षा और प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंचाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। सागर क्षेत्र में जल समस्या को गंभीरता से समझते हुए जल संरक्षण के उपाय अपनाने तथा भूमिहीनों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने की आवश्यकता है।
सामाजिक समरसता मंच के राष्ट्रीय संयोजक  के. श्याम प्रसाद  ने किसान और भूमिहीन किसान के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि किसान वह है जिसके पास खेती योग्य भूमि है, जबकि भूमिहीन किसान के पास भूमि नहीं होती। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता का लक्ष्य जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करना है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे विश्वविद्यालय के कुलाधिपति  कन्हैयालाल बेरवाल ने कहा कि मध्यप्रदेश के सागर क्षेत्र से अनेक श्रमिक राजस्थान मजदूरी करने जाते हैं। कई परिवार अपने बच्चों को भी साथ ले जाते हैं, जिससे उनकी शिक्षा प्रभावित होती है। इस दिशा में ठोस व्यवस्था की आवश्यकता है।
अनुभवात्मक परिचर्चा एवं प्रतिपुष्टि सत्र में किसानों और श्रमिकों से संवाद किया गया। इसमें पानी की समस्या, जल संरक्षण, रोजगार की कमी, पलायन तथा आजीविका संबंधी अनेक समस्याओं पर विमर्श किया गया । प्रोफेसर संजय पासवान  ने समाधान हेतु सुझाव देते हुए कहा कि एमएसडब्ल्यू के विद्यार्थी अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर समस्याओं का अध्ययन करें, संबंधित अधिकारियों को सूचित करें तथा सरकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी लोगों तक पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि संवाद से संवेदनाएं जागृत होती हैं लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि समाधान के लिए पहल करना भी आवश्यक है।
कार्यक्रम के समापन सत्र में प्रतिभागियों ने भूमिहीन कृषि श्रमिकों के हित में ठोस नीतिगत पहल, जल संरक्षण, रोजगार सृजन तथा शिक्षा सुविधाओं के विस्तार पर सामूहिक संकल्प व्यक्त किया। उपस्थित सभी अतिथियों ने कहा कि इस वर्ग के उत्थान के लिए समाज, शासन और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर कार्य करना होगा।
अंत में विधि विभाग के प्रोफेसर हिमांशु पांडे ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के सफल समापन की घोषणा की। कार्यक्रम के सफल आयोजन में समन्वयक प्रो. मंगल सिंह बिसेन, सह-समन्वयक डॉ. संजय शर्मा, माननीय कुलसचि डॉ. सत्यप्रकाश उपाध्याय, डॉ. शशि कुमार सिंह, डॉ. अतिभा विजया सिंह, प्रो. अजीत कुमार जायसवाल, हिमांशु कुमार पाण्डेय, प्रो. नेत्रपाल सिंह, डॉ. आर. वेंकट मुनि रेड्डी, डॉ. विवेक जायसवाल, डॉ. योगेश कुमार पाल, डॉ. शत्रुघन प्रसाद, डॉ. जयंती, रोहित, प्रिंस, आकांक्षा, ऐश्वर्या, श्रेया, विश्वविद्यालय परिवार, सामाजिक समरसता मंच के पदाधिकारीगण तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं एवं किसानों का विशेष सहयोग रहा ।

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