डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित चतुर्थ सारस्वत व्याख्यान माला में डॉ. सञ्जय कुमार ने आयुर्वेदीय आचार्य परम्परा एवं स्वास्थ्य विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित चतुर्थ सारस्वत व्याख्यान माला में डॉ. सञ्जय कुमार ने आयुर्वेदीय आचार्य परम्परा एवं स्वास्थ्य विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया

आयुर्वेदीय आचार्य परम्परा ब्रह्मा से आरम्भ होती है- डॉ. सञ्जय कुमार

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के संयुक्त तत्त्वावधान में चतुर्थ सारस्वत व्याख्यान माला का ऑनलाइन आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में IQAC के निदेशक डॉ. अनिल कुमार जैन ने कहा कि आयुर्वेद सभी चिकित्सा पद्धतियों की जननी है और यह केवल रोग उपचार नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की कला और विज्ञान सिखाता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि आयुर्वेद की आचार्य परम्परा के जीवित रहने से ही इसकी निरंतरता और प्रासंगिकता बनी हुई है।
इस व्याख्यानमाला का मुख्य विषय ‘आयुर्वेदीय आचार्य परम्परा एवं स्वास्थ्य’ था, विषय के मुख्य वक्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत प्राध्यापक
डॉ. संजय कुमार ने अपने उद्बोधन में कहा कि आयुर्वेद का अस्तित्व सृष्टि के प्रारंभ से ही माना जाता है और यह केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन जीने का विज्ञान है। उन्होंने बताया कि मानव जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है, जो स्वस्थ रहते हुए धर्म, अर्थ आदि पुरुषार्थों के माध्यम से संभव होती है।
उन्होंने व्याधियों को मुख्यतः दो वर्गों शारीरिक व मानसिक में विभाजित करते हुए स्पष्ट किया कि शारीरिक रोगों की निवृत्ति वात, पित्त और कफ के संतुलन से होती है, जबकि मानसिक विकारों को रजस् और तमस् के संतुलन द्वारा दूर किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने मानव जीवन को अत्यंत दुर्लभ बताते हुए इसके संरक्षण और संवर्धन में आयुर्वेद की भूमिका को रेखांकित किया।
डॉ. सञ्जय कुमार ने आयुर्वेद की आचार्य परम्परा को ब्रह्मा से आरंभ मानते हुए चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, अष्टांग हृदयम् तथा अथर्ववेद संहिता जैसे प्राचीन ग्रंथों के उद्धरणों के माध्यम से अपने विचारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किये।
संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. राजेन्द्र यादव जी ने आयुर्वेद विषय पर होने वाले व्याख्यान को प्रासंगिक बताते हुए कहा कि आज जहां भीषण गर्मी में लोग रोगग्रस्त हो रहे हैं वहां हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा का आयुर्वेद ही एकमात्र पूर्ण निदान है।भाषाध्ययनशाला की अध्यक्षा प्रो.रश्मिसिंह ने इस कार्यक्रम के संस्कृत विभाग को शुभकामनाएं दीं और इस तरह के सुंदर प्रासंगिक कार्यक्रम को निरंतर करते रहने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. किरण आर्या ने अपने संबोधन में आयुर्वेद के सिद्धांतों को आधुनिक जीवन शैली से जोड़ने पर बल दिया, ताकि वर्तमान पीढ़ी इसके लाभों को समझकर अपने दैनिक जीवन में अपना सके।
इस व्याख्यान माला में संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. शशि कुमार सिंह, डॉ. नौनिहाल गौतम, और डॉ. रामहेत गौतम ने कार्यक्रम को और अधिक गरिमामय बनाया।
इस व्याख्यान माला में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यशवंत ठाकुर, भाषा अध्ययन शाला की अधिष्ठाता प्रो. रश्मि सिंह, संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र यादव,वैदिक अध्ययन विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ आयुष गुप्ता ,पांडुलिपि अध्ययन केन्द्र से ऋषभ भारद्वाज तथा देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और शोधार्थी भी जुड़े। प्रतिभागी बिहार, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक और अन्य राज्यों से जुड़े थे। स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. सुकदेव वाजपेयी भी उपस्थित हुए।लगभग 100 प्रतिभागियों ने इस व्याख्यान माला में भाग लिया।
यह व्याख्यान माला विश्वविद्यालय द्वारा प्रत्येक माह नियमित रूप से विभिन्न विषयों पर आयोजित की जाती है ।
कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग के शोधार्थी शैलेश तिवारी ने किया तथा वैदिक मङ्गलाचरण एम.ए की छात्रा शिक्षा नायक ने प्रस्तुत की। धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम के सहसंयोजक शोधार्थी भूपेंद्र लोधी ने किया।

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