
आपातकाल लोकतंत्र पर सबसे बड़ा प्रहार था, देश कभी नहीं भूलेगा वह काला अध्याय – भूपेन्द्र सिंह
युवाओं को आपातकाल का इतिहास जानना और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सजग रहना होगा – भूपेन्द्र सिंह
सागर। पूर्व गृहमंत्री, विधायक एवं वरिष्ठ भाजपा नेता भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह काली रात है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह वह दिन था जब सत्ता के अहंकार ने संविधान की भावना को कुचल दिया, लोकतंत्र का गला घोंट दिया और देश की जनता से उसके मौलिक अधिकार छीन लिए गए। स्वतंत्र भारत में पहली बार ऐसा हुआ जब सरकार ने स्वयं अपने नागरिकों के विरुद्ध लोकतांत्रिक संस्थाओं का दमन किया। देश पर आपातकाल थोपकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को बंदी बना लिया गया। इसलिए भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आपातकाल केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि लोकतंत्र पर लगा एक काला धब्बा है।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के केवल 28 वर्ष बाद ही देश ने वह दुर्भाग्यपूर्ण दौर देखा, जब सत्ता को बचाने के लिए लोकतंत्र को ही कैद कर लिया गया। यह भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास था कि जिस संविधान ने नागरिकों को अधिकार दिए थे, उसी संविधान की भावना की हत्या कर दी गई। उन्होंने कहा कि आपातकाल की पृष्ठभूमि 12 जून 1975 को बने राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ी थी, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। सत्ता बचाने के लिए 25 जून 1975 की आधी रात को राष्ट्रपति से हस्ताक्षर कराकर संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत देश पर आपातकाल लागू कर दिया गया और इसके साथ ही भारत का लोकतंत्र एक ऐसे अंधकारमय दौर में प्रवेश कर गया, जहां सत्ता सर्वोपरि और नागरिक अधिकार गौण बना दिए गए।
उन्होंने कहा कि आपातकाल लागू होते ही सबसे पहले विपक्ष की आवाज को कुचलने का अभियान चलाया गया। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख, राजमाता विजयाराजे सिंधिया, राजनाथ सिंह, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, जॉर्ज फर्नांडिस, चंद्रशेखर सहित हजारों राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विचारकों को रातों-रात गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं ने उस दौर में लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाखों लोगों को बिना किसी मुकदमे के जेलों में रखा गया। असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार के बजाय अपराध मान लिया गया और पूरे देश में विरोध की हर आवाज को दबाने का सरकारी अभियान चलाया गया।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि स्वतंत्र पत्रकारिता का गला घोंट दिया गया और प्रेस को सरकारी नियंत्रण की जंजीरों में जकड़ दिया गया। समाचार पत्रों पर कड़ी सेंसरशिप लागू कर दी गई। सरकार की आलोचना करने वाली कोई भी खबर प्रकाशित नहीं हो सकती थी। कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने विरोधस्वरूप अपने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिए, ताकि देश समझ सके कि लोकतंत्र की आवाज पर पहरा बैठा दिया गया है। उन्होंने कहा कि मीडिया लोकतंत्र का चैथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन आपातकाल में उसे भी सत्ता के दबाव में काम करने के लिए विवश किया गया।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो राष्ट्र निर्माण और सामाजिक जागरण का एक महत्वपूर्ण संगठन रहा है, उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। हजारों स्वयंसेवकों को जेलों में बंद किया गया। भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर लोकतंत्र बचाने का संघर्ष जारी रखा। अनेक कार्यकर्ताओं ने यातनाएं सहीं, परिवारों से दूर रहे और जेलों की कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन लोकतंत्र की रक्षा के अपने संकल्प से पीछे नहीं हटे। यह संघर्ष किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र को बचाने का राष्ट्रीय आंदोलन था।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि आपातकाल के दौरान न्यायपालिका पर भी दबाव बनाने की कोशिश की गई। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि यह प्रश्न खड़ा हो गया कि क्या किसी नागरिक को अपने जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार भी है। नागरिकों से न्याय मांगने और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के संवैधानिक अधिकार तक छीन लिए गए थे। यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए अत्यंत भयावह स्थिति थी। जब नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका तक न पहुंच सकें, तब लोकतंत्र का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता है।
उन्होंने कहा कि इस कालखंड का एक और काला अध्याय जबरन नसबंदी अभियान था। जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर प्रशासनिक शक्ति का खुला दुरुपयोग किया गया। लाखों गरीब, मजदूर और ग्रामीण नागरिकों को दबाव, भय और सरकारी तंत्र के माध्यम से नसबंदी के लिए मजबूर किया गया। कई स्थानों पर सरकारी योजनाओं का लाभ लेने, नौकरी बनाए रखने अथवा अन्य सुविधाएं प्राप्त करने के लिए भी लोगों पर नसबंदी का दबाव डाला गया। यह नागरिक गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा हमला था, जिसकी पीड़ा आज भी देश की सामूहिक स्मृति में दर्ज है।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि सत्ता की निरंकुशता भारत की लोकतांत्रिक चेतना को पराजित नहीं कर सकी। जेलों की काल कोठरियों में बंद लोकतंत्र सेनानियों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और लाखों देशभक्त नागरिकों ने लोकतंत्र की मशाल बुझने नहीं दी। लोकतंत्र बचाने का आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन का संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को बचाने का महायज्ञ था। राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े हजारों कार्यकर्ताओं ने संघर्ष, त्याग और बलिदान के माध्यम से लोकतंत्र की रक्षा की और देश को यह संदेश दिया कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए किसी भी कीमत पर संघर्ष किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि सन् 1977 में जब चुनाव हुए तो भारतीय जनता ने मतपेटी के माध्यम से इतिहास रच दिया। जनता ने लोकतंत्र का गला घोंटने वालों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। यह विश्व इतिहास की एक अनूठी घटना थी, जब जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से निरंकुश प्रवृत्तियों को पराजित किया। इस जनादेश ने सिद्ध कर दिया कि भारत की लोकतांत्रिक जड़ें अत्यंत गहरी हैं और यहां की जनता स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति सदैव सजग रहेगी।
भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि भारत के युवाओं को यह जानना चाहिए कि लोकतंत्र स्वतः सुरक्षित नहीं रहता। प्रत्येक पीढ़ी को इसकी रक्षा के लिए जागरूक और प्रतिबद्ध रहना पड़ता है। आपातकाल का इतिहास केवल अतीत का अध्याय नहीं, बल्कि भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है। लोकतंत्र की रक्षा, संविधान का सम्मान और नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोकतंत्र सेनानियों को राष्ट्र सदैव कृतज्ञता और सम्मान के साथ स्मरण करता रहेगा।












