
प्रेमचंद जयंती पर आयोजित द्विदिवसीय कहानी लेखन कार्यशाला सफलतापूर्वक संपन्न
सागर। पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, सागर एवं मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित द्विदिवसीय कहानी लेखन कार्यशाला का सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यशाला के दूसरे दिन कहानी की भाषा, शिल्प, लोक और रचनात्मकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत स्वरचित कहानियों पर विस्तृत समीक्षा एवं संवाद भी आयोजित किया गया।
कार्यशाला के दूसरे दिन महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने ‘कहानी में लोक’ विषय पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि भारतीय समाज में लोक का क्षितिज अत्यंत व्यापक है। हमारे यहाँ इतनी समृद्ध लोककथाएँ और लोक परंपराएँ हैं कि उन सभी को लिपिबद्ध करना अत्यंत कठिन कार्य है। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि “जो आपको वेद में नहीं मिलेगा, वह आपको लोक में मिलेगा।” उन्होंने कहा कि लोक हमारे बचपन से ही हमारी चेतना, संवेदना और संस्कारों का अभिन्न अंग रहा है तथा यही लोक जीवन साहित्य को जीवन्तता और व्यापकता प्रदान करता है।
वरिष्ठ कथाकार महेश कटारे ने कहानी की भाषा और शिल्प विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि उनका सम्पूर्ण रचनाकर्म लोक जीवन से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। वे स्वयं लोक में रचते-बसते हैं और लोक उनके व्यक्तित्व एवं लेखन में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। इसलिए उन्हें अपने लेखन में लोक को शामिल करने के लिए किसी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती। उन्होंने प्रतिभागियों को सलाह दी कि वे कृत्रिमता से बचते हुए अपने अनुभवों और परिवेश से कहानियाँ रचें।
नगर की वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शरद सिंह ने भाषा और शिल्प पर विस्तृत व्याख्यान दिया। उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि विश्व की सबसे बड़ी कहानी अरेबियन नाइट्स तथा सबसे छोटी कहानी अर्नेस्ट हेमिंग्वे की मानी जाती है। उन्होंने कहा कि वाचिक परंपरा से चली आ रही कहानियों की अपनी अलग भाषिक चुनौतियाँ होती हैं, जबकि लिखित कहानियों में शिल्प का विशेष महत्व होता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि लेखक को अपनी मूल भाषा, अपनी बोली और अपने सांस्कृतिक परिवेश को कहानी में स्थान देना चाहिए, क्योंकि वही उसकी रचना को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।
अगले सत्र में प्रतिभागियों ने समूहवार अपनी स्वरचित कहानियों का पाठ किया। अनिकेत दुबे, जागेन्द्र कुशवाहा, आशुतोष क्षत्रिय, सुरजीत सिंह, अभिषेक ठक्कर तथा हर्षिता सिंह ने अपनी कहानियाँ प्रस्तुत कीं। इन कहानियों पर वरिष्ठ कथाकार महेश कटारे, विख्यात कहानीकार विवेक मिश्र, डॉ. रेखा कस्तवार, डॉ. शरद सिंह, डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव सहित उपस्थित विद्वानों ने विस्तार से समीक्षा करते हुए कथ्य, भाषा, शिल्प, पात्र-निर्माण, संवाद, कथानक और प्रस्तुति के विभिन्न पक्षों पर महत्वपूर्ण सुझाव दिए। प्रतिभागियों ने विशेषज्ञों से संवाद कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया।
समापन अवसर पर कार्यशाला में सहभागिता करने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। वक्ताओं ने आशा व्यक्त की कि इस प्रकार की कार्यशालाएँ नवोदित रचनाकारों को साहित्य-सृजन की दिशा में निरंतर प्रेरित करेंगी तथा हिंदी कहानी लेखन की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।
कार्यक्रम में गंजबासौदा से पधारे वरिष्ठ प्राध्यापक एवं कवि डॉ. मणिशंकर, मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पलाश सुरजन, महामंत्री अभिषेक वर्मा, साहित्य मंत्री डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव, कार्यकारिणी सदस्य महेश श्रीवास्तव, जिला इकाई के अध्यक्ष आशीष ज्योतिषी, सचिव पुष्पेन्द्र दुबे सहित सम्मेलन के अनेक पदाधिकारियों एवं सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
इसके अतिरिक्त नगर की वरिष्ठ साहित्यकार टीकाराम त्रिपाठी, डॉ चंचला दवे,डॉ. छाया चौकसे, अभिषेक ऋषि ,पी.आर. मलैया, डॉ. विजय शाक्य सहित अनेक साहित्यकार, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने भी बड़ी संख्या में सहभागिता कर कार्यशाला को सफल बनाया।











