
भवानी सेवा समिति द्वारा संत शिरोमणि श्री रविदास जी की जन्म जयंती मनाई गई
वार्ड के अहिरवार बंधुओ और समस्त वार्डवासियों द्वारा रविदास जी के छायाचित्र पर तिलक लगाकर कर सभी ने उन्हें नमन किया इस अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता इंजी. आकाश कोरी (मासाब) ने रविदास जी के छायाचित्र पर तिलक लगाकर और माल्यार्पण कर उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरू रविदास जी का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत 1433 को हुआ था।उनके पिता संतोख दास तथा माता का नाम कलसांं देवी था। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी बताया जाता है।रविदास जी जूते बनाने का काम किया करते थे औऱ यही उनका व्यवसाय था। प्रारम्भ से ही रविदास जी बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। इन्होंने ब्राह्मणी धर्म में व्याप्त कुरीतियों और अज्ञानता के लिए आम जनमानस को धार्मिक अंधविश्वास और आडंबर से दूर रहने का संदेश दिया।एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले,गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु।गंगा स्नान के लिए जाने पर मेरा मन यहाँ लगा रहेगा तो मुझे पुण्य कैसे प्राप्त होगा? अतः मन जो काम करने के लिए अपने अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इस कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि – मन चंगा तो कठौती में गंगा।
रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया। उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है।ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है।अभिमान शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे कि विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की चींटी इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अभिमान तथा बड़प्पन का भाव त्याग कर विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।
आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है। विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं। इस अवसर पर अमित,राज,रोशन,योगेश,पंकज,मोगली,प्रिंस,राजवीर,संतोष, राजेश,अमन,शैलेंद्र,माधव, विकास आदि उपस्थित रहे।











