
श्रावण सोमवार विशेष: रुद्राभिषेक के पांच प्रमुख प्रकार, जानिए किस अभिषेक का क्या है महत्व
देवरी। श्रावण मास के सोमवार को भगवान शिव की आराधना और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है। शास्त्रों और पुराणों में भगवान शिव के अभिषेक के विभिन्न विधान बताए गए हैं। मान्यता है कि शिवलिंग पर विधि-विधान से रुद्राभिषेक करने से भगवान महादेव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
कर्मकांड एवं ज्योतिष विशेषज्ञ डॉ. अनिल दुबे के अनुसार, रुद्राभिषेक के कई प्रकार बताए गए हैं, लेकिन प्रमुख रूप से पांच प्रकार माने जाते हैं—षडंग पाठ (रूपक), रुद्री या एकादशिनी, लघुरुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र।
1. रूपक या षडंग पाठ
रुद्र के छह अंग माने गए हैं। इन छह अंगों का विधि-विधान से पाठ षडंग पाठ कहलाता है। इसमें शिवकल्प सूक्त, पुरुष सूक्त, अप्रतिरथ सूक्त, मैत्र सूक्त और शतरुद्रीय आदि का विधान बताया गया है। सम्पूर्ण रुद्राध्याय के दस अध्यायों का षडंग रूपक पाठ किया जाता है। इसमें आठवें अध्याय के साथ पांचवें अध्याय की आवृत्ति नहीं होती।
2. रुद्री या एकादशिनी
रुद्राध्याय की ग्यारह आवृत्तियों को रुद्री या एकादशिनी कहा जाता है। रुद्रों की संख्या ग्यारह होने के कारण इसे ग्यारह अनुवाकों में विभाजित किया गया है।
3. लघुरुद्र
एकादशिनी रुद्री की ग्यारह आवृत्तियों के पाठ को लघुरुद्र कहा जाता है। इसे एक दिन में 11 ब्राह्मणों द्वारा एक साथ संपन्न किया जा सकता है। इसके अलावा एक ब्राह्मण अथवा स्वयं साधक द्वारा 11 दिनों तक प्रतिदिन एक एकादशिनी पाठ करने से भी लघुरुद्र अनुष्ठान पूरा किया जा सकता है।
4. महारुद्र
लघुरुद्र की ग्यारह आवृत्तियां, अर्थात एकादशिनी रुद्री का कुल 121 आवृत्ति पाठ, महारुद्र अनुष्ठान कहलाता है। इसे सामान्यतः 11 ब्राह्मणों द्वारा 11 दिनों तक कराया जाता है।
5. अतिरुद्र
महारुद्र की 11 आवृत्तियां, अर्थात एकादशिनी रुद्री का कुल 1331 आवृत्ति पाठ, अतिरुद्र अनुष्ठान कहलाता है। इसे अनुष्ठानात्मक, अभिषेकात्मक और हवनात्मक—तीनों प्रकार से संपन्न किया जा सकता है। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इन तीनों विधियों का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।
रुद्राभिषेक में प्रयुक्त द्रव्य और उनसे जुड़ी मान्यताएं
डॉ. अनिल दुबे के अनुसार, परंपरा में रुद्राभिषेक के लिए अलग-अलग द्रव्यों का उपयोग और उनके अलग-अलग फल बताए गए हैं।
जल से अभिषेक — वर्षा की कामना के लिए।
कुशोदक जल से अभिषेक — व्याधियों की शांति के लिए।
दही से अभिषेक — पशुधन की प्राप्ति की कामना के लिए।
इक्षु रस (गन्ने के रस) से अभिषेक — लक्ष्मी प्राप्ति की कामना के लिए।
मधु (शहद) से अभिषेक — धन-समृद्धि की कामना से।
घी एवं तीर्थजल से अभिषेक — मोक्ष की कामना के लिए।
दूध से अभिषेक — स्वास्थ्य एवं संतान प्राप्ति की कामना से।
जलधारा से अभिषेक — ज्वर आदि की शांति की धार्मिक मान्यता है।
सरसों के तेल से अभिषेक — शत्रु बाधा और विवादों से मुक्ति की कामना से।
शक्कर मिले जल से अभिषेक — संतान प्राप्ति की कामना से।
इत्र मिले जल से अभिषेक — स्वास्थ्य एवं शरीर की शुद्धि की कामना से।
दूध में काले तिल मिलाकर अभिषेक — रोग एवं शत्रु बाधा से विजय की धार्मिक मान्यता है।
उन्होंने बताया कि विभिन्न प्राकृतिक रसों से भी भगवान शिव का अभिषेक किया जा सकता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विधि-विधान से किए गए रुद्राभिषेक से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
रुद्र पाठ और अभिषेक का विशेष महत्व
डॉ. दुबे के अनुसार, रुद्राध्याय के केवल पाठ अथवा जप का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। रुद्र का पाठ, जप अथवा अभिषेक करने या कराने वाले व्यक्ति के लिए शास्त्रों में आध्यात्मिक उन्नति और पापों से मुक्ति की मान्यता बताई गई है।
उन्होंने श्रावण सोमवार के अवसर पर श्रद्धालुओं से यजुर्वेद विधान के अनुसार विधि-विधान से रुद्राभिषेक और भगवान शिव की आराधना करने का आग्रह किया।











