युवाओं को गीता के कर्मयोग और श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन से सीखना चाहिए : अविराज सिंह

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धार्मिक आयोजनों में शामिल हुए अविराज सिंह, धर्म, संस्कार, सेवा और सद्भाव को जीवन का आधार बनाने का किया आह्वान
सागर। युवा नेता अविराज सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण का स्मरण स्वयं में एक पवित्र प्रार्थना है। उनका जीवन मनुष्य को धर्म, विवेक, सदाचार, कर्तव्य और कठिन परिस्थितियों में धैर्य के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। युवाओं को विशेष रूप से भगवद्गीता के कर्मयोग और श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन को समझकर उसे अपने व्यवहार और जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
अविराज सिंह सागर में पीतल फैक्ट्री, डीमार्ट के पास भोपाल रोड पर पं. श्री अनिल शास्त्री जी के सानिध्य में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में शामिल हुए। इसके साथ ही ग्राम बेरखेड़ी, सुबंश में कथा वाचक पं. श्रीराम मनोहर उपाध्याय जी महाराज के सानिध्य में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा के भव्य आयोजन में भी उन्होंने सहभागिता की। उन्होंने सदर बाजार सागर स्थित देवश्री जाहरवीर गोगाजी चौहान महाराज मंदिर में नवमी के अवसर पर प्रतिवर्षानुसार आयोजित हवन-पूजन एवं भंडारे में भी शामिल होकर श्रद्धालुओं से भेंट की।
इस दौरान अविराज सिंह ने कहा कि धार्मिक आयोजन समाज को आध्यात्मिक ऊर्जा देने के साथ ही लोगों को अपनी संस्कृति, संस्कार और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से समाज में प्रेम, सेवा, सद्भाव और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता की भावना को मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म, संस्कार और सदाचार को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।
‘भज गोविन्दम्’ का संदेश आज भी प्रासंगिक
अविराज सिंह ने आदि शंकराचार्य के ‘भज गोविन्दम्’ का उल्लेख करते हुए कहा कि सांसारिक ज्ञान और उपलब्धियां जीवन के अंतिम सत्य के सामने सीमित हैं, जबकि ईश्वर का स्मरण मनुष्य को आत्मिक आधार प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि ध्यान मांगा नहीं जाता, बल्कि अपने आचरण और साधना से अर्जित किया जाता है। इसी प्रकार प्रशंसा और सम्मान की अपेक्षा करने के बजाय व्यक्ति को ऐसे कर्म करने चाहिए, जिनसे समाज स्वयं उसका सम्मान करे।
उन्होंने कहा कि ईर्ष्या मनुष्य की दृष्टि को दूसरों की कमियां तलाशने में उलझा देती है। इससे व्यक्ति अपनी क्षमताओं, उपलब्धियों और जीवन में मिले अवसरों को पहचान नहीं पाता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने कर्म, चरित्र और आचरण को बेहतर बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
महाभारत से मिलती है धर्म और विवेक की सीख
अविराज सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण के जीवन और महाभारत के विभिन्न प्रसंगों में धर्म और अधर्म के बीच अंतर समझने के साथ-साथ मनुष्य के आचरण की भी गहरी सीख मिलती है। जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म होता है, उसके भीतर दूसरों के दर्द और पीड़ा के प्रति संवेदनशीलता विकसित होती है।
उन्होंने कहा कि स्वार्थ मनुष्य के विवेक को कमजोर कर देता है। जब स्त्री, धन, जमीन अथवा प्रतिष्ठा जैसे विषय स्वार्थ का केंद्र बन जाते हैं, तो व्यक्ति बड़े से बड़ा संघर्ष मोल लेने से भी पीछे नहीं हटता। महाभारत इस बात का उदाहरण है कि स्वार्थ, अहंकार और आपसी मतभेद किस प्रकार बड़े विनाश का कारण बन सकते हैं।
उन्होंने कहा कि भय से भरा हुआ हृदय स्वयं एक कारागार बन जाता है। इसलिए जीवन में धर्म और सत्य के प्रति विश्वास रखने के साथ कठिन परिस्थितियों का सामना करने का साहस भी आवश्यक है।
अर्जुन को निर्णय लेने योग्य बनाया श्रीकृष्ण ने
अविराज सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन के लिए स्वयं निर्णय नहीं लिया, बल्कि उसके भ्रम को दूर कर उसके भीतर विवेक और कर्तव्यबोध को जागृत किया, ताकि वह स्वयं सही निर्णय ले सके। आज के युवाओं के लिए इसमें महत्वपूर्ण सीख छिपी है कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह सही आचरण और निर्णय में परिवर्तित हो।
उन्होंने कहा कि युवाओं को भगवद्गीता के कर्मयोग के संदेश को समझना चाहिए और अपने जीवन में कर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए। गीता का कर्मप्रधान संदेश मनुष्य को अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहने और परिणाम की चिंता से ऊपर उठकर उचित कर्म करने की प्रेरणा देता है।
अविराज सिंह ने कहा कि युवावस्था जीवन को गति देती है, जबकि अनुभव और वृद्धावस्था उसे दिशा देने का कार्य करती है। इसलिए युवाओं को अपनी ऊर्जा के साथ अनुभव और ज्ञान का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना चाहिए।
प्रेम, विश्वास और सहयोग से मजबूत होता है समाज
उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का संदेश केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी मार्गदर्शन देता है। जहां मतभेद बढ़ते हैं, वहां सामूहिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है। महाभारत के प्रसंगों में भी आपसी मतभेद और एकमत होकर निर्णय न ले पाने की स्थिति के परिणाम देखने को मिलते हैं।
उन्होंने कहा कि समाज में परस्पर प्रेम, विश्वास और सहयोग की भावना मजबूत होना जरूरी है। धार्मिक आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि इनके माध्यम से सामाजिक समरसता, सेवा, सद्भाव और एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता का संदेश जन-जन तक पहुंचना चाहिए। यही इन आयोजनों की वास्तविक सार्थकता है।
कर्मों को बेहतर बनाने का निरंतर प्रयास जरूरी
अविराज सिंह ने कहा कि मनुष्य के जीवन में उसके कर्मों का विशेष महत्व है। गीता का कर्मप्रधान संदेश व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक करता है। जीवन में मिलने वाली परिस्थितियों का सामना धैर्य और सकारात्मक सोच के साथ करते हुए प्रत्येक व्यक्ति को निरंतर अपने कर्मों को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी विवेक, धैर्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। धार्मिक कथाओं और संतों के विचारों को सुनने का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब उनसे मिली सीख हमारे व्यवहार और जीवनशैली में दिखाई दे।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने धार्मिक आयोजनों में सहभागिता के लिए अविराज सिंह का स्वागत किया। कथा, हवन-पूजन एवं भंडारे में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धार्मिक कार्यक्रमों का लाभ लिया।

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