
मार्शल आर्ट सम्पूर्ण सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है जिसमें सौंदर्य और आत्मबल का संदेश है
राष्ट्रीय नाट्य समारोह में कलाकारों ने दी बुदेलखंड की मार्शल आर्ट परम्परा की सजीव प्रस्तुति
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में उत्तर-मध्यक्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं विश्वविद्यालय सांस्कृतिक परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 20 फरवरी से 24 फरवरी 2026 को पाँच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन किया जा रहा है । इस पांच दिवसीय आयोजन की परिकल्पना सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज के निदेशक सुदेश शर्मा द्वारा की गई है जिसे विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक परिषद् के संयुक्त प्रयास से आयोजित किया जा रहा है ।
समारोह के पांचवे और अंतिम दिन के प्रथम सत्र में आयोजित विशेष कार्यशाला में पद्मश्री भगवान दास रैकवार की मार्शल आर्ट की टीम उनके सुपुत्र राजकुमार रैकवार के साथ उपस्थित हुई। कार्यशाला का आरंभ होते ही पूरा वातावरण बदल गया। बुंदेली मार्शल आर्ट के पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों की झंकार और कलाकारों की भाव-भंगिमाओं ने उपस्थित विद्यार्थियों और दर्शकों को एक अलग ही युग में पहुँचा दिया। टीम की प्रस्तुति ने यह सिद्ध किया कि यह केवल युद्ध कला नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है जिसमें लय है, ताल है, सौंदर्य है और आत्मबल का संदेश है।
श्री रैकवार ने विद्यार्थियों के साथ खुलकर संवाद करते हुए बताया कि यह बुंदेलखंड के अखाड़ों की मार्शल आर्ट विधा है, जो इस अंचल के लोगों की आत्मरक्षा और आत्मनिर्भरता का माध्यम रही है। उन्होंने कहा कि इस कला में सिर्फ शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि मानसिक एकाग्रता, अनुशासन और सांस्कृतिक गौरव का भाव भी समाहित है। उन्होंने इस मार्शल आर्ट में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों लाठी, भाला, तलवार, ढाल, फरसा आदि के उपयोग की बारीकियाँ विस्तारपूर्वक समझाईं। साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि किस प्रकार इन अस्त्रों का उपयोग सांकेतिक शैली में रंगमंच पर किया जा सकता है, जिससे नाट्य प्रस्तुतियाँ और अधिक जीवंत, प्रभावशाली तथा प्रामाणिक बन सकती हैं। श्री रैकवार ने यह समझाया कि लोक युद्ध कला की हर मुद्रा, हर गतिविधि, हर लय में एक नाटकीय भाव छुपा है। यदि रंगकर्मी इस परंपरा को आत्मसात कर लें, तो न केवल उनके अभिनय में एक नई ऊर्जा आएगी बल्कि बुंदेलखंड की यह लोक परंपरा भी नई पीढ़ी तक जीवंत रूप में पहुँच सकेगी। उन्होंने कहा कि नाट्य प्रस्तुतियों में इस कला का समावेश एक साथ दो उद्देश्यों की पूर्ति करता है. पहला, रंगमंच को एक समृद्ध देशज सौंदर्यशास्त्र मिलता है और दूसरा इस विलुप्त होती लोक विधा को नया जीवन मिलता है.
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. राकेश सोनी ने बताया कि पद्म श्री भगवानदास जी वह व्यक्तित्व हैं जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन बुंदेलखंड की लुप्त होती मार्शल आर्ट परंपरा को जीवित रखने में समर्पित कर दिया है और जिन्हें इस वर्ष 2026 में भारत सरकार ने पद्मश्री से अलंकृत किया. उन्होंने एक सांस्कृतिक योद्धा की तरह इस परंपरा को थामे रखा। उन्होंने मध्यप्रदेश में ‘छत्रसाल अखाड़ा’ की स्थापना की और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस लोक युद्ध कला को न केवल जीवित रखा बल्कि उसे एक नई प्रासंगिकता प्रदान की।
डॉ. नीरज उपाध्याय ने कहा कि बुंदेलखंड की धरती वीरों की धरती रही है। महाराजा छत्रसाल की इस भूमि पर लोक युद्ध कला की एक समृद्ध परंपरा सदियों से पल्लवित होती रही है। यहाँ के अखाड़े केवल शरीर को साधने के स्थान नहीं थे, बल्कि वे सांस्कृतिक, सामाजिक और आत्मरक्षा की शिक्षा के जीवंत केंद्र थे। लाठी, भाला, तलवार, ढाल जैसे परंपरागत अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित यह युद्ध विधा यहाँ के आम जनमानस की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा रही। किंतु आधुनिकता की आँधी में यह अमूल्य विरासत धीरे-धीरे विस्मृत होने लगी.
इस कार्यशाला में यह संदेश था कि भारत की लोक परंपराएं, उसके अखाड़े, उसकी मिट्टी से उपजी युद्ध कलाएं, केवल इतिहास की विषय-वस्तु नहीं हैं, बल्कि समकालीन सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के सजीव स्रोत हैं। इस कार्यशाला ने नई पीढ़ी के रंगकर्मियों के मन में उस विरासत के प्रति एक नई जिज्ञासा और सम्मान का भाव जागृत किया।











