
झीकनी घाटी आश्रम में खाटूश्याम जी के उपलक्ष्य में भव्य मेला, बर्बरीक के त्याग का स्मरण – अविराज सिंह
बांदरी। झीकनी घाटी, बांदरी स्थित श्री अर्धनारीश्वर सेवा संस्थान आश्रम में फाल्गुन मास के पावन अवसर पर भगवान श्री खाटूश्याम जी के उपलक्ष्य में भव्य मेले का आयोजन किया गया। इस अवसर पर युवा नेता अविराज सिंह ने कहा कि भगवान खाटू श्याम, जिनका मूल नाम बर्बरीक था, महाभारत के अत्यंत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किए, जिससे वे ‘तीन बाणधारी’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। अग्निदेव ने उन्हें दिव्य धनुष प्रदान किया, जो तीनों लोकों में विजय दिलाने में समर्थ था।
अविराज सिंह ने कहा कि जब बर्बरीक अपनी माता से आशीर्वाद लेने पहुंचे तो उन्होंने हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। भगवान श्रीकृष्ण जानते थे कि महाभारत युद्ध में कौरवों की पराजय निश्चित है। धर्म की रक्षा हेतु भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से उनका शीश दान में मांगा, और बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के अपना शीश काटकर अर्पित कर दिया। उनका यह त्याग त्याग की पराकाष्ठा माना जाता है।
उन्होंने कहा कि जब बर्बरीक ने अपना शीश दान किया, तब देवर्षि नारद सहित समस्त देवताओं ने पुष्पवर्षा कर उन्हें ‘महाबली’ और ‘शीशदानी’ की उपाधि दी। उनका यह त्याग कलयुग के प्राणियों के लिए कष्ट निवारण और मोक्ष का सुलभ मार्ग माना गया।
उन्होंने बताया कि शीश दान करते समय बर्बरीक ने महाभारत युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनका शीश एक पर्वत पर स्थापित कर दिया, जहाँ से उन्होंने संपूर्ण युद्ध देखा। युद्ध समाप्ति के बाद पांडवों में यह विवाद हुआ कि विजय का श्रेय किसे है। तब भगवान श्रीकृष्ण सभी को बर्बरीक के पास ले गए। बर्बरीक ने स्पष्ट कहा कि इस युद्ध में सर्वाधिक शक्तिशाली भगवान श्रीकृष्ण थे, जिन्होंने अर्जुन के सारथी बनकर धर्म की विजय सुनिश्चित की।
अविराज सिंह ने कहा कि बर्बरीक की भक्ति और त्याग से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि वे कलयुग में ‘श्याम’ नाम से पूजे जाएंगे। जो व्यक्ति जीवन में हर ओर से पराजित होकर उनके शरण में आएगा, उसकी हार को भी वे विजय में परिवर्तित करेंगे। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु आज भी खाटूश्याम जी के दर्शन कर अपने कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं।अविराज सिंह ने कहा कि बर्बरीक की भक्ति और त्याग से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि वे कलयुग में ‘श्याम’ नाम से पूजे जाएंगे। जो व्यक्ति जीवन में हर ओर से पराजित होकर उनके शरण में आएगा, उसकी हार को भी वे विजय में परिवर्तित करेंगे। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु आज भी खाटूश्याम जी के दर्शन कर अपने कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव हमें यह शिक्षा देते हैं कि अपना तीसरा नेत्र तभी खोलना चाहिए जब अत्यंत आवश्यक हो। इसी प्रकार हमें भी अपने ज्ञान का प्रदर्शन तभी करना चाहिए जब आवश्यकता हो। जीवन में संयम और धैर्य आवश्यक है, परंतु धैर्य की भी एक मर्यादा होनी चाहिए।
अविराज सिंह ने कहा कि नंदी भगवान हमें एकाग्रता की प्रेरणा देते हैं। उनका ध्यान सदैव शिवलिंग की ओर रहता है, जिससे हमें यह सीख मिलती है कि यदि जीवन में निरंतर प्रभु के दर्शन और स्मरण होते रहें तो इससे बड़ा कोई सुख नहीं हो सकता।
फाल्गुन मास की द्वादशी तिथि वह ऐतिहासिक दिवस है जब बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण को अपना शीश दान किया था। यह दिन त्याग, समर्पण और धर्मनिष्ठा का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि धर्म की रक्षा के लिए अहंकार और स्वार्थ का त्याग ही सच्ची भक्ति है।
प्राचीन काल में संचार के साधन सीमित थे। उस समय मेले ही सामाजिक संपर्क का प्रमुख माध्यम थे, जहाँ दूर-दराज के गांवों के लोग एकत्रित होकर संवाद और व्यापार करते थे। आज भी मेले सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में मेले स्थानीय व्यापार और अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हैं। शिल्पकारों, बुनकरों और छोटे व्यापारियों को अपने उत्पाद बेचने का व्यापक मंच मिलता है। हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद और पशु व्यापार जैसे अनेक आर्थिक गतिविधियाँ इन मेलों के माध्यम से संचालित होती हैं, जो ग्रामीण आजीविका का महत्वपूर्ण आधार हैं।
महाशिवरात्रि और होली जैसे पर्वों के अवसर पर आयोजित ऐसे मेले समाज में उत्साह, ऊर्जा और आपसी भाईचारे का संचार करते हैं। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने का प्रभावी माध्यम हैं, जहाँ विभिन्न वर्गों, जातियों और धर्मों के लोग एक साथ आकर ‘विविधता में एकता’ की भावना को मजबूत करते हैं।
इस अवसर पर क्षेत्र के सैकड़ों श्रद्धालु भक्तिभाव से सम्मिलित हुए। मेले में धार्मिक अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और प्रसादी वितरण का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में युवा नेता अविराज सिंह विशेष रूप से उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में परमपूज्य गुरुजी जितेन्द्र दास महाराज, पं. राजेन्द्र प्रसाद, पं. नंदराम बाबा नरयावली, श्री अर्धनारीश्वर सेवा संस्थान कार्य समिती, लक्ष्मीनारायण मुढोतिया, महेन्द्र यादव, रमेश मढोतिया उपस्थित रहे।











