भगवान श्री परशुराम के पावन जन्म महोत्सव पर

भगवान श्री परशुराम के पावन जन्म महोत्सव पर।

त्रिभुवन का तेज सिमट आया भृगु कुल का तप साकार हुआ।
सौभाग्य प्रपूरित धरा हुई जब परशुराम अवतार हुआ।।
वैषाख तृतीया शुक्ल पक्ष थी दशों दिशाएं हर्ष मगन।
जमदग्नि रेणुका के कुटीर में प्रकट हुआ अनमोल रतन।।
किन्नर गंधर्व मृदंग बजा कर प्रमुदित करते यश गायन।
नायायण नर बन कर आये सुर बालाएं करतीं नर्तन।।
चंद्रमा सदृश मुख मंडल गौर शरीर नयन कुछ अरुणारे।
पंकज पांखुरी समान अधर सिर कुंचित केश राशि धारे।।
उन्नत ललाट भुजदंड पीन बल के सागर गुण के आगर।
द्विज वंश हंस अवतंस महा प्रतिभा संपन्न सुभट नागर।।
दो धनुष त्रोण दो दो शोभित कांधे पर परशु विराजमान।
जिसका अवलोकन करते ही रिपु दल के जाते सूख प्राण।।
मानों प्रचंडता पूरित विवस्वान वसुधा पर उतर पड़ा।
शिव ब्रह्मा विष्णु द्वार आए भार्गव कुल का सौभाग्य बढ़ा।।शिशु पन से ही शश्त्रों को क्रीड़ा का उपकरण बनाया था।
शठ को शठता के माध्यम से ही ब्रह्म मिटाने आया था।।
कैलाश गये गणपति ने शिव के दर्शन में व्यवधान किया।
निर्भय होकर भृगु नंदन ने प्रलयंकर फरसा तान दिया।।
एक ही प्रहार किया एक दन्त काट वसुधा पर डाल दिए।
शिव के घर जाकर महामहिम ने
यह दुर्धर्ष कमाल किए।।
फिर कीर्ति वीर्य अर्जुन जिसको था सहस भुजाओं का गुमान।
ले गया छीन कर कामधेनु यह समाचार जब पड़ा कान।।
ले परशु चला ज्यों महाकाल तरु शाखा जैसे छांट दिये।
तुम सहसबाहु की सहस भुजाएं एक प्रहार में काट दिए।।
गुरु दत्तात्रेय अनंत सिद्धियां दिए किंतु सब नष्ट हुईं।
त्रिभुवन में परशुराम की महा शौर्य क्षमता स्पष्ट हुई।।
थे दस हजार सुत सहस बाहु के सब ने मिल षडयंत्र किया।
जमदग्नि अकेले थे आश्रम में सबने मिलकर सिर काट दिया।।
समिधा लेकर आए यह दशा पिता की लख आवेश भरा।
था चंड दिवाकर जुगुनू दल का सर्व नाश करने उतरा।।
सारे पुत्रों को काल गाल में भेज कठिन संकल्प लिए।
इक्कीस बार इस धरा धाम को
भार्गव भूप विहीन किए।।
फिर पंच समंतक कुंड बना भर दिए रक्त से महाभाग।
कर महायज्ञ गुरु कष्यप के श्री चरणों में फिर सानुराग।।
वसुधा सब अर्पित कर डाले बन गये अकिंचन भृगु नंदन।
तप हेतु महेंद्र शैल जाकर तुम करने लगे कठिन साधन।।
त्रेतायुग में श्री राम भद्र जब कौशिक संग मिथिला आये।
शिव धनुष विखंडन किये दिशाएं कांपीं पर्वत भहराए।।
जिस गहन गुफा में आप वहां भी प्रलय दृश्य साकार हुआ।
टूटने शिलाएं लगी चतुर्दिक
हाहाकार अपार हुआ।।
ध्वनि के उद्गम की ओर चले छण में मिथिला नगरी आए।
लख सूखे प्राण नरेशों के सब समाचार जब सुन पाए।।
हो परम क्रुद्ध रघुकुल भूषण पर छण में फरसा तान दिये।
लक्ष्मण से वाद विवाद हुआ फिर रघुबर को पहचान लिये।।
दे धनुष कलाएं चार इसी माध्यम से कर हरि को अर्पण।
चल पड़े तपस्या हेतु पुनः कर परम क्रोध का आकर्षण।।
द्वापर में भीष्म कर्ण आदिक को धनुर्वेद का दिया दान।
कलियुग में अजर अमर होकर मुनियों को देते ब्रह्म ज्ञान।।
तुम महामृत्यु को जीत चुके तुम इंद्रिय जीत तपस्वी हो।
हो ब्रह्म किंतु मानव स्वरुप में ऋषि हो परम मनस्वी हो।।
सारदा शेष सौ कल्पों तक गुण गायें पूर्ण नहीं होगा।
है कृपा तुम्हारी नहीं नाथ तो रिपुदल चूर्ण नहीं होगा।।
चहुं ओर अनीति अधर्म कुकर्मों का तांडव नर्तन स्वामी।
एक बार परशु फिर कर में लो निर्मूल करो कपटी कामी।।
निर्मल,, चरणों में साष्टांग दंडवत तुम्हारे करता है।
जिस पर हो कृपा परशुधर की भय सागर से वह तरता है।।
अक्षय तिथि को तुम जन्म लिये अक्षय हो प्रभु अविकारी हो।
तुम विष्णु नृसिंह राम वामन माधव गोवर्धन धारी हो।।
हे नारायण कलियुग में जो प्राणी पद शीश झुकाएगा।
निर्मल,, होगा उसका चरित्र जो परशुराम गुण गाएगा।।
परशुराम भगवान की जय हो।। कर्मकांड ज्योतिष विषेशज्ञ डॉ अनिल दुबे वैदिक देवरी बिछुआ 9936443138

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