डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में ऑनलाइन सारस्वत व्याख्यान का हुआ सफल आयोजन

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में ऑनलाइन सारस्वत व्याख्यान का हुआ सफल आयोजन

सम्राट अशोक के अभिलेखों में निहित हैं मानवीय मूल्य और विश्वबंधुत्व की भावना- डॉ. विकास सिंह

भारत की सभी लिपि ब्राह्मी लिपि से निकली है- डॉ. विकास सिंह

सागर। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के संस्कृत विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (IQAC) के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित मासिक सारस्वत व्याख्यानमाला के अन्तर्गत पञ्चम व्याख्यान का आयोजन ऑनलाइन माध्यम से संपन्न हुआ। इस व्याख्यान का विषय “अशोक के अभिलेख : ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य” रहा। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, जम्मू के तुलनात्मक धर्म एवं सभ्यता केंद्र विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. विकास सिंह थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने की।
अपने व्याख्यान में डॉ. विकास सिंह ने अभिलेखों के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं मानवीय पक्षों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मुख्यतः दो शास्त्र- पुरालिपि तथा अभिलेखशास्त्र प्राचीन इतिहास के अध्ययन के आधार स्तंभ हैं। अभिलेख इतिहास को समझने का एक महत्त्वपूर्ण साधन हैं। उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता तथा महाजनपद सभ्यता के संदर्भों का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 1835 में जेम्स प्रिंसेप ने पहली बार ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता प्राप्त की तत्पश्चात् खरोष्ठी लिपि का भी अध्ययन हुआ।
उन्होंने कहा कि सम्राट अशोक के अभिलेखों में मानवीय मूल्यों, पशु-पक्षियों के प्रति करुणा, विश्वबंधुत्व तथा “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। अशोकावदान, महावंश आदि ग्रंथों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि श्रीलंका के महावंश ग्रंथ में “देवानांप्रिय प्रियदर्शी” को सम्राट अशोक के रूप में चिह्नित किया गया। उन्होंने पिपहरवा शिलालेख, गिरनार शिलालेख, रुम्मिनदेई शिलालेख, भाब्रू लघु शिलालेख तथा बराबर गुहा अभिलेख पर विशेष चर्चा की।
डॉ. सिंह ने बताया कि अशोक के अभिलेखों में यज्ञों के नाम पर जीवों की हत्या रोकने, नैतिक जीवन अपनाने तथा लोककल्याण की भावना को विशेष महत्त्व दिया गया है। उन्होंने विदिशा, शाक्यदेश आदि स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अशोक के अभिलेख केवल राजकीय प्रशंसा तक सीमित नहीं थे, बल्कि उनमें मानव जीवन के विविध आयामों का चित्रण मिलता है। उन्होंने यह भी बताया कि “दानम्” शब्द के आधार पर ब्राह्मी लिपि की पहचान स्थापित हुई तथा भारत की अधिकांश लिपियों का विकास ब्राह्मी लिपि से ही हुआ है। व्याख्यान के दौरान उन्होंने पालि, यूनानी, ब्राह्मी एवं खरोष्ठी लिपियों का भी विवेचन किया तथा भगवान बुद्ध से संबंधित ‘ललितविस्तर’ ग्रंथ का संक्षिप्त प्रतिपादन प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम में आईक्यूएसी (IQAC) के निदेशक प्रो. अनिल जैन ने कहा कि इस प्रकार के व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों की अकादमिक दृष्टि को व्यापक बनाते हैं तथा उनमें शोधपरक चिंतन विकसित करते हैं। भाषा अध्ययनशाला की अधिष्ठाता प्रो. रश्मि सिंह ने अपने उद्बोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा एवं अभिलेखीय अध्ययन की महत्ता पर प्रकाश डाला तथा विद्यार्थियों को भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के गहन अध्ययन हेतु प्रेरित किया।
कार्यक्रम की संयोजक डॉ. किरण आर्या ने व्याख्यानमाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में इतिहास, संस्कृति एवं भाषा अध्ययन के प्रति नवीन दृष्टिकोण विकसित करते हैं। संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. रामहेत गौतम ने अतिथियों का स्वागत किया तथा कार्यक्रम की भूमिका प्रस्तुत की।
कार्यक्रम आयोजन मंडल के सदस्य संस्कृत विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. शशि कुमार सिंह एवं नौनिहाल गौतम ने कार्यक्रम के सफल संचालन एवं समन्वय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत विभाग के शोधार्थी सौरभ मिश्र ने किया। वैदिक मंगलाचरण रामाकांत द्वारा प्रस्तुत किया गया। आभार नैनिका लुहार ने किया।
इस अवसर पर स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ. सुकदेव वाजपेयी, दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत विभाग के सह प्राध्यापक डॉ. सञ्जय कुमार, डॉ सुधा बीएचयू से, डॉ अभय, भोपाल लक्ष्मी कालेज से प्रो. राजीव जी, नालंदा विश्वविद्यालय से ममता जी, रंजन जी, पत्रकार बिहार से, महेंद्र कुमार जी, झारखंड से, जम्मू विश्वविद्यालय से दीपलता जी आदि कई विद्वान् , शोधार्थी आभासीय माध्यम से जुड़े।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कार्यक्रम में म्यांमार वर्मा से जिस्हिन जी ने अपनी सहभागिता की जो बौद्धधर्मानुयायी हैं। इस अवसर पर देश के विभिन्न प्रांतों के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता कर कार्यक्रम को सफल बनाया।

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