
सागर। हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। यह दिन पितरों की आत्मशांति, तर्पण, दान-पुण्य और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। भाद्रपद मास की अमावस्या को कुशोत्पाटिनी, कुशग्रहणी और पिठौरी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन धार्मिक कार्यों और श्राद्ध कर्म में उपयोग होने वाली कुशा एकत्रित करने की परंपरा है।
कर्मकांड ज्योतिष विशेषज्ञ डॉ. अनिल दुबे वैदिक के अनुसार, धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कुशा को अत्यंत पवित्र माना गया है और इसका एक नाम पवित्री भी है। पूजा, यज्ञ, तर्पण, श्राद्ध, ग्रहशांति तथा अन्य कर्मकांडों में कुशा का प्रयोग किया जाता है।
11 सितंबर को कुश एकत्रित करने की मान्यता
इस वर्ष कुशोत्पाटिनी अमावस्या के अवसर पर 11 सितंबर को कुशा एकत्रित करने की मान्यता है। अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे से प्रारंभ होकर 11 सितंबर को सुबह 8:56 बजे तक रहेगी। धार्मिक परंपरा के अनुसार कुशा संग्रह के लिए सूर्योदय के आसपास का समय विशेष उपयुक्त माना जाता है।
कुशा एकत्रित करने के प्रमुख मुहूर्त—
ब्रह्म मुहूर्त : सुबह 4:25 से 5:05 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 11:53 से 12:43 बजे तक
विजय मुहूर्त : दोपहर 2:23 से 3:14 बजे तक
गोधूलि मुहूर्त : शाम 6:32 से 6:55 बजे तक
कुशा का धार्मिक महत्व
शास्त्रों में कहा गया है—
“पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचि:।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया॥”
अर्थात पूजा के समय कुश धारण करने से व्यक्ति पवित्र माना जाता है और कुश के बिना पूजा को पूर्ण नहीं माना गया है।
कुशा से बनी पवित्री या अंगूठी अनामिका उंगली में धारण करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे पूजा एवं तर्पण के दौरान आध्यात्मिक ऊर्जा की रक्षा होती है। देवपूजन, यज्ञ, हवन, यज्ञोपवीत, ग्रहशांति तथा कलश स्थापना जैसे धार्मिक कार्यों में भी कुशा का उपयोग किया जाता है।
कैसे एकत्र करें कुशा
मान्यता के अनुसार कुशा को हाथ से ही सावधानीपूर्वक उखाड़ना चाहिए। कुश का अग्रभाग पूरा और अखंड होना चाहिए। कुशा निकालने से पहले पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके प्रार्थना करने की परंपरा है।
“कुशाग्रे वसते रुद्र: कुश मध्ये तु केशव:।
कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान् मे देहि मेदिनी॥”
इसके बाद निर्धारित मंत्र का उच्चारण करते हुए दाहिने हाथ से कुशा एकत्र करने की धार्मिक परंपरा बताई गई है।
पितृ कर्म और तर्पण में विशेष उपयोग
अमावस्या पर पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान और दान का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार श्राद्ध और तर्पण कर्म में कुशा का उपयोग आवश्यक है। भाद्रपद अमावस्या के दिन एकत्र की गई कुशा को पूरे वर्ष होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग करने की परंपरा है।
देवपूजन में प्रयुक्त कुशा का पुनः उपयोग किया जा सकता है, जबकि पितृ एवं प्रेत कर्म में प्रयुक्त कुशा को दोबारा उपयोग नहीं करने की परंपरा बताई गई है।
कुशा आसन का भी विशेष महत्व
धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा से बने आसन का उपयोग प्राचीन समय से किया जाता रहा है। मान्यता है कि कुशासन पर बैठकर साधना, मंत्र जाप और पूजा करने से मन की एकाग्रता बनी रहती है। आध्यात्मिक साधना में कुशासन को विशेष महत्व दिया गया है।
कुशा से बनी माला और पवित्री का प्रयोग भी विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। केतु से संबंधित धार्मिक शांति विधानों में भी कुशा के उपयोग का उल्लेख मिलता है।
पिठौरी अमावस्या पर देवी दुर्गा की पूजा
भाद्रपद अमावस्या को पिठौरी अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की पूजा का विधान बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार विवाहित महिलाएं संतान प्राप्ति तथा अपनी संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से व्रत एवं पूजा करती हैं।
अमावस्या पर किए जाने वाले प्रमुख धार्मिक कार्य
प्रातः स्नान कर सूर्य देव को अर्घ्य देना।
तिल का दान एवं तर्पण करना।
पितरों की आत्मशांति के लिए पिंडदान करना।
जरूरतमंद व्यक्ति अथवा ब्राह्मण को दान-दक्षिणा देना।
पीपल के वृक्ष के नीचे शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाना।
पितरों का स्मरण करते हुए पीपल की परिक्रमा करना।
शनिदेव की पूजा एवं प्रार्थना करना।
श्रद्धा के अनुसार कालसर्प दोष निवारण से संबंधित पूजा-अनुष्ठान करना।
पौराणिक मान्यता में भी कुशा का विशेष स्थान
कुशा से जुड़ी पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कलश और गरुड़ की कथा का उल्लेख मिलता है। मान्यता के अनुसार गरुड़ जब अमृत लेकर आए तो उसे कुश के आसन पर रखा गया था। बाद में अमृत कलश वहां से ले लिया गया। अमृत की बूंदों के स्पर्श के कारण कुशा को अत्यंत पवित्र माना जाने लगा।
इसी कथा से जुड़ी मान्यता के अनुसार अमृत की तलाश में सांपों द्वारा कुशा को चाटने पर उनकी जीभ बीच से विभाजित हो गई। यही कारण बताया जाता है कि सांपों की जीभ दो भागों में होती है और कुशा का संबंध अमृत से जोड़ा जाता है।
डॉ. अनिल दुबे वैदिक बताते हैं कि कुशा भारतीय धार्मिक परंपरा में केवल एक घास नहीं, बल्कि पूजा, यज्ञ, तर्पण और श्राद्ध जैसे महत्वपूर्ण कर्मों का अभिन्न हिस्सा है। भाद्रपद अमावस्या पर विधि-विधान से कुशा संग्रह करने की परंपरा इसी धार्मिक महत्व को दर्शाती है।
कर्मकांड ज्योतिष विशेषज्ञ : डॉ. अनिल दुबे वैदिक, देवरी-बिछुआ
मोबाइल : 9936443138











