धर्म और ज्ञान का मूल स्त्रोत है दिव्य ग्रंथ श्रीमद् भागवत-अविराज सिंह

धर्म और ज्ञान का मूल स्त्रोत है दिव्य ग्रंथ श्रीमद् भागवत-अविराज सिंह

खुरई। गुरूवार को युवा भाजपा नेता अविराज सिंह खुरई विधानसभा क्षेत्र के ग्राम खेजरा दुगाहा और ग्राम सुमरेरी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के आयोजन में शामिल हुए। इससे पहले कथा की शुरुआत कथावाचक पं. पुरूष्कार प्रभु ने श्रद्धालुओं के साथ भागवत पूजन के साथ की। अविराज सिंह ने कथावाचक पं. पुरूष्कार प्रभु श्री रमण जी महाराज को श्रीफल भेंट कर श्रीमद्भागवत कथा का सोपान किया। ग्राम सुमरेरी और नगदा में भागवत कथा के समापन पर प्रसादी वितरण किया।

कथावाचक पं. श्री पुरूष्कार प्रभु जी ने कहा कि हर मनुष्य को श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। कलयुग का अमृत है भागवत कथा। इसे सुनने से व्यक्ति परम भागवत धाम को प्राप्त करता है। श्री मद् भागवत कथा बड़े से बड़े पापियों को भी पापमुक्त करे देती है, इसलिए जहां कही भी कथा हो रही हो इसका श्रवण करना चाहिए। प्रत्येक प्राणी किसी न किसी तरह से दुखी व परेशान है। कोई स्वास्थ्य से दुखी है, कोई परिवार, कोई धन, तो कोई संतान को लेकर परेशान है। सभी परेशानियों से मुक्ति पाने के लिए ईश्वर की आराधना की एकमात्र मार्ग है। इसलिए व्यक्ति को अपने जीवन का कुछ समय हरिभजन में लगाना चाहिए।

अविराज सिंह ने कहा कि श्रीमद्भागवत कथा ईश्वर का परिपूर्ण स्वरूप है, इसलिए यह दिव्य ग्रंथ है। भागवत ज्ञान, योग, कर्मयोग, समाज, धर्म व ज्ञान का मूल स्रोत है, इसलिए मनुष्य को हर पल ईश्वर का चिंतन करना चाहिए। जो आनंद ईश्वर की आराधना में हैं, वह आनंद संसार के किसी भौतिक सुख में नहीं है। श्रीमद्भागवत के श्रवण मात्र से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। श्री मद्भागवत गीता के अध्याय 4 में श्लोक 7-8 में लिखा है,‘‘ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् श्रीमद्भागवत गीता का यह एक लोकप्रिय श्लोक है. महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश उस समय दिया था जब वे अपने पराए के भेद में उलझ गए थे. तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरूक्षेत्र में यह ज्ञान कराया।

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