
नाहर मऊ में हुई आगजनी की यह घटना बेहद दुखद और चिंताजनक है। कल्याण विश्वकर्मा, जगमोहन विश्वकर्मा और राजू विश्वकर्मा के परिवारों का घर, राशन और वर्षों की मेहनत कुछ ही देर में राख हो जाना पूरे क्षेत्र के लिए पीड़ादायक है।
राहत की बात यह रही कि इस हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई। ग्रामीणों, सरपंच और स्थानीय लोगों की तत्परता ने आग को पूरे गांव में फैलने से रोक दिया, जो सराहनीय है। मौके पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस टीम ने भी स्थिति संभालने का प्रयास किया। विशेष रूप से थाना प्रभारी नासिर फारूकी और उनकी टीम की त्वरित मौजूदगी उल्लेखनीय रही।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल फायर ब्रिगेड की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। ग्रामीणों के अनुसार लगभग एक घंटे की देरी और डायल 112 पर कथित तौर पर नंबर ब्लॉक किए जाने जैसी बातें बेहद गंभीर हैं। यदि वायरल वीडियो और आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि आपदा के समय संवेदनहीनता मानी जाएगी। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी शहरों की।
ऐसी स्थिति में फायर ब्रिगेड को सूचना मिलने के तुरंत बाद 15 से 20 मिनट के भीतर मौके पर पहुंचना चाहिए था। आग जैसी घटनाओं में हर मिनट की देरी नुकसान को कई गुना बढ़ा देती है।
अब जरूरी है कि:
पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।
देरी और कथित लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो।
प्रभावित परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता, राशन, कपड़े और आवासीय मदद उपलब्ध कराई जाए।
ग्रामीण क्षेत्रों में फायर स्टेशन, वाहन और आपातकालीन संसाधनों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं में तुरंत मदद पहुंच सके।
ग्रामीणों का आक्रोश स्वाभाविक और जायज है। प्रशासन को इस घटना को केवल एक हादसा मानकर नहीं, बल्कि ग्रामीण आपदा प्रबंधन की बड़ी चेतावनी के रूप में लेना चाहिए।










