प्रेमचंद जयंती पर द्विदिवसीय कहानी लेखन कार्यशाला का प्रथम दिवस सफलतापूर्वक संपन्न

प्रेमचंद जयंती पर द्विदिवसीय कहानी लेखन कार्यशाला का प्रथम दिवस सफलतापूर्वक संपन्न

हम अपने अनुभवों और जिए हुए जीवन से कहानी लिखना सीखते हैं- महेश कटारे

आपकी किस्सागोई ही आपको कहानीकार बनाती है-विवेक मिश्रा

रचनाकार, अपनी रचना के माध्यम से एक वैकल्पिक संसार रच सकता है-रेखा कस्तवार

सागर/ (01 अगस्त)/मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल तथा जिला इकाई सागर एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, सागर के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित द्विदिवसीय कहानी लेखन कार्यशाला का प्रथम दिवस सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती पूजन के उपरांत मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से पलास सुरजन ने तथा
जिला इकाई की ओर से अध्यक्ष आशीष ज्योतिषी ने स्वागत उद्बोधन दिया ।
संचालन अरुण डनायक,श्रद्धा श्रीवास्तव एवं महेश प्रकाश श्रीवास्तव ने किया।

अनेक सत्रों में सम्पन्न कार्यशाला में वरिष्ठ साहित्यकारों एवं कथाकारों ने कहानी की परंपरा, शिल्प, संवेदना और रचना-प्रक्रिया पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए तथा प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया।

कार्यक्रम के प्रारंभ में महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने सभी साहित्यकारों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया। अपने उद्बोधन में उन्होंने बुन्देली कहानी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हमारी लोकसंस्कृति में कहानी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनानुभवों और लोकबुद्धि की वाहक रही है। उन्होंने बुन्देली लोककथन का उल्लेख करते हुए कहा कि जब बुंदेली में कहानी पूरी होती है तो कहा जाता है— “बढ़ई ने बनाई टिपटी, हमाई कहानी निपटी।” इस लोकवाक्य में हमारी कथा-परंपरा की आत्मीयता और सहजता समाहित है।

ग्वालियर से आए विषय विशेषज्ञ वरिष्ठ कथाकार महेश कटारे ने रूसी साहित्यकार मैक्सिम गोर्की की प्रसिद्ध कृति “मेरे विश्वविद्यालय” का उल्लेख करते हुए कहा कि कहानी लिखने की सबसे बड़ी पाठशाला जीवन स्वयं है। हम अपने अनुभवों और जिए हुए जीवन से कहानी लिखना सीखते हैं। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि वर्ष 1982-83 में अमरकंटक में आयोजित एक साहित्यिक कार्यशाला में भाग लेने का अवसर मिला था। वहाँ जितना उन्होंने व्याख्यानों से सीखा, उससे कहीं अधिक एक सप्ताह तक बड़े साहित्यकारों के साथ रहकर सीखा। उन्होंने कहा कि कार्यशाला किसी को कहानीकार नहीं बनाती, बल्कि कहानीकार के भीतर मौजूद अंकुर पर जमी पपड़ी को हटाकर उसकी सृजनात्मक क्षमता को बाहर लाती है। संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जिसके पास कहानी न हो, किंतु हर व्यक्ति उसे कह या लिख नहीं पाता, क्योंकि कहानी कहने के लिए एक विशेष शऊर और दृष्टि की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि कहानी सामान्य व्यक्ति को समझाती है और उसे सही दिशा की ओर ले जाने का कार्य करती है।

सागर की साहित्यकार डॉ. लक्ष्मी पांडेय ने “प्रेमचंद, कहानी की परंपरा और हमारा समय” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रेमचंद की साहित्यिक दृष्टि, सामाजिक सरोकारों तथा समकालीन संदर्भों में उनकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

दिल्ली से पधारे विख्यात कहानीकार विवेक मिश्र ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि शिल्प कोई अलग चीज़ नहीं, बल्कि कहानी कहने का अपना विशिष्ट तरीका है। आपकी किस्सागोई ही आपको कहानीकार बनाती है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले अपने भीतर के किस्सागो को पहचानिए और उसे बाहरी दबावों से मुक्त होकर अभिव्यक्ति का अवसर दीजिए। कहानी दूसरों के लिए नहीं, पहले अपने लिए लिखिए। विचार आते ही उसे तुरंत लिखना प्रारंभ कर देना चाहिए, जबकि उसे पूरा करने में पर्याप्त समय और धैर्य देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बुरा समय लेखक का सबसे बड़ा शिक्षक होता है। अनुभव तो सभी करते हैं, किंतु महत्वपूर्ण यह है कि आपने उसे किस भाव और दृष्टि से देखा है। ज्ञान केवल रटा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि अर्जित अनुभव है। अपने अनुभवों को समृद्ध कीजिए, तभी आपकी रचना में नवीनता आएगी। उन्होंने कहा कि जो हमें जाति, भाषा, क्षेत्र या किसी अन्य आधार पर छोटा महसूस कराए, वह हमारे लिए हितकारी नहीं हो सकता। राजा का इतिहास होता है और जनता का साहित्य। किसी भी भाषा को अच्छी या बुरी कहना अनुचित है; भाषा तो हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है। उन्होंने प्रतिभागियों को सलाह दी कि कहानीकार के रूप में कभी भी पाठक को प्रभावित करने का प्रयास न करें, क्योंकि पाठक प्रभावित नहीं, बल्कि भावित होना चाहता है।

डॉ. रेखा कस्तवार ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि कहानी लिखने से पहले अध्ययन से मनन तक की यात्रा आवश्यक है। इसके बाद कल्पना और फंतासी कहानी के निर्माण में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि लेखक की जिज्ञासा ही कहानी की खोज करती है तथा पात्रों का मनोविज्ञान, परिवेश और सामाजिक परिदृश्य रचती है। संवेदना कहानी का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, जो रचनाकार को जीवन-मूल्यों की सृष्टि करने में सक्षम बनाती है। मौलिकता लेखक को सर्जक बनाती है, जबकि विश्वसनीयता उसे पाठकों के विश्वास का पात्र बनाती है। उन्होंने कहा कि रचनाकार का कार्य संसार को चौकन्नी दृष्टि से 360 डिग्री के कोण पर देखना है। रूसी कथाकार अंतोन चेखब का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि ज़िंदगी हमें अपनी रफ़ कॉपी को फेयर कॉपी में बदलने का अवसर नहीं देती।

कार्यशाला का अगला सत्र डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव के संचालन में संपन्न हुआ। इस सत्र में पठन, विश्लेषण एवं अभ्यास के अंतर्गत प्रतिभागियों के विभिन्न समूहों ने उन्हें दी गई अलग-अलग कहानियों का अध्ययन कर उनकी समीक्षा प्रस्तुत की। इसके पश्चात प्रतिभागियों एवं विद्वानों के मध्य कहानी की रचना-प्रक्रिया पर संवाद हुआ, जिसमें विशेषज्ञों ने प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं एवं प्रश्नों का विस्तार से समाधान किया। अंतिम सत्र में वरिष्ठ कहानीकारों द्वारा प्रभावशाली कहानी-पाठ भी किया गया।

कार्यक्रम में मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पलाश सुरजन, महामंत्री अभिषेक वर्मा, साहित्य मंत्री डॉ. श्रद्धा श्रीवास्तव, कार्यकारिणी सदस्य महेश श्रीवास्तव, जिला इकाई के अध्यक्ष आशीष ज्योतिषी, सचिव पुष्पेन्द्र दुबे प्रदीप पांडे ,अमित आठ्या ,आर के तिवारी,सहित सम्मेलन के अनेक पदाधिकारियों एवं सदस्यों की गरिमामयी उपस्थिति रही। इस अवसर पर उदय चंद जैन , मनोहर चौरसिया, डॉ संतोष सहगोरा,वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शरद सिंह, डॉ. टीकाराम त्रिपाठी, नवनीत धगट, पेट्रिस फुसकेले, आर के तिवारी,प्रदीप तिवारी,अमित आठ्या, मुकेश तिवारी,माधव चंदा, डॉ सुजाता मिश्रा ,दमोह से केशु तिवारी, रमेश तिवारी, मानव बजाज दासहित अनेक साहित्यकार, शोधार्थी एवं विद्यार्थी भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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