
प्रकृति और संस्कृति के साथ समन्वय ही साक्षरता है : डॉ. राजेन्द्र सिंह
जीवन का अनुशासन ही साक्षरता का उद्देश्य है : कुलपति प्रो. वाय. एस. ठाकुर
सागर. डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के जीवनपर्यंत शिक्षा विभाग द्वारा 60वें अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर भूमंडलीय समृद्धि के लिए लोक साक्षरता विषय पर अंतराष्ट्रीय साक्षरता दिवस का आयोजन अभिमंच सभागार में व्याख्यान आयोजित किया गया.
कार्यक्रम के आरम्भ में अतिथि परिचय एवं स्वागत उद्बोधन देते हुए जीवनपर्यंत शिक्षा विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार जैन ने बताया कि उच्च शिक्षा संस्थानों का मूल मकसद सिर्फ किताबी ज्ञान का प्रचार-प्रसार और हस्तांतरण करना ही नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी से अवगत कराना और उन्हें इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने योग्य बनाना भी है. ताकि जल, गगन, भूमि और इस समूचे पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके. सही अर्थों में शिक्षा का ध्येय भी यही है.
इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता जलपुरुष और विश्व विख्यात पर्यावरणवेत्ता डॉ. राजेन्द्र सिंह ने भूमंडलीय समृद्धि के लिए लोक साक्षरता विषय पर अपने बीज वक्तव्य में बताया कि पढ़ने-लिखने की योग्यता अर्जन संबंधी साक्षरता की संकल्पना विद्यार्थियों का व्यक्तित्व रचने, उनके जीवन को सुधारने और संवारने के बजाय उन्हें स्वार्थी, रोजगार प्राप्ति और स्वप्रगति करने के उद्देश्यों तक सीमित बना रही है. किसी चीज को समझकर और सहेजकर उसके साथ जीना और उसे व्यवहृत करना सही मायने में साक्षरता है. शास्त्रों में इसे विद्या कहा गया है और आधुनिक शिक्षा प्रणाली में इसे साक्षरता कहते हैं. जिस साक्षरता के जरिये हम अपनी प्रकृति और अपनी संस्कृति को जानते और समझते हुए उसे जीने के लायक / योग्य बनाते हैं जो हमारे साझे भविष्य को बेहतर बनाती है ऐसी जीवन विद्या की हमारे प्राचीन ज्ञान परम्परा में चर्चा की गई है, किन्तु सच्चाई तो यह है कि आधुनिक साक्षरता हमारे जीवन के इस साझापन को संबलित करने के बजाय उसे समाप्त करती चली जा रही है. इतना ही नहीं हमारी आज की शिक्षा प्रणाली हमें हमारी मूल प्रकृति एवं संस्कृति से विघटित और दूर कर रही है लेकिन विद्या ऐसा नहीं करती थी वह हमें हमारी संस्कृति व प्रकृति से सम्बद्ध करने का कार्य करती थी. इस पूरी पृष्ठभूमि में हमें इस बात को समझना होगा कि यदि हम दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं तो हमें अपनी वृत्ति और दृष्टि को समझना होगा. पर्यावरण के क्षेत्र में एक लम्बे अरसे से किये गये कार्यों और उनसे प्राप्त अनुभवों के आधार पर डॉ. सिंह ने तमाम वैश्विक संकटों की ओर इशारा किया. जिनमें से एक है जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित संकट. सरकार के दस्तावेजों एवं वैश्विक रिपोर्टों एवं आंकड़ों के हवाले से उन्होंने बताया कि आज पूरी दुनिया जलवायु संबंधी आपातकाल का सामना कर रही है. इसलिए विद्यार्थियों में इस महत्वपूर्ण आयाम से सम्बन्धित ज्ञान, समझ, कौशल एवं अभिवृत्तियां विकसित किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि यह जलवायु संबंधी ज्ञान ही है जो हम सभी को जीवनीयता प्रदान कर सकता है. दूसरा संकट हमारे समक्ष संसाधनों के अभाव के कारण उत्पन्न होने वाले व्यक्तियों के विस्थापन से सम्बन्धित है जिसका मुख्य कारण अपनी जड़ों से दूर होना भी है. तीसरे संकट के बारे में चिंता जताते हुए उन्होंने आह्वान किया कि हमें इस बात को समझना होगा कि पूरी दुनिया में अपने आपको लोकतांत्रिक कहने वाले देश वास्तव में लोकतांत्रिक नहीं हैं बल्कि वे कॉर्पोरेट जगत का भरण-पोषण करने वाले अथवा कॉर्पोरेट डेमोक्रेसी हैं जहाँ के नागरिक समाज, उनकी सरकारों, कॉर्पोरेट एजेंसियों के कामकाजी पद्धतियों में कोई संबंध नहीं है. विच्छेद की यह संस्कृति और प्रकृति पूरी दुनिया को उन्नत तो बिलकुल भी नहीं बना सकती. अपने वक्तव्य के अंत में उन्होंने यह सुझाया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ओर बढ़ते चले जाने की इस यात्रा में हमें मानवीय बुद्धिमत्ता को नहीं भूलना चाहिए, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ हमें मानवीय बुद्धिमत्ता को एकीकृत करते हुए ही आगे बढ़ना होगा.
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यशवंत सिंह ठाकुर ने इस बात पर बल दिया कि हमें साक्षरता की पुरातन एवं आधुनिक अवधारणाओं को नए अर्थ संदर्भों में समझना और परखना होगा. क्योंकि साक्षरता का तात्पर्य पढ़ने-लिखने की योग्यता रखने वाले और ऊँची-ऊँची उपाधियाँ प्राप्त व्यक्तियों की संख्यात्मक वृद्धि करना नहीं है. बल्कि साक्षरता ऐसी होनी चाहिए जो हमें अनुशासित करने के साथ ही साथ अच्छा इंसान बनाए, हमारे भीतर नागरिकता बोध विकसित कर सके, हमें अपनी पारम्परिक जड़ों से दूर न करे बल्कि उसके प्रति जुड़ाव एवं सम्मान का भाव बनाये रखे. ताकि हम अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और पूरी दुनिया के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझ सकें. क्योंकि अंततः साक्षरता का उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से उन्नत बनाना है.
कार्यक्रम में दलपतपुर ग्राम से आये पुरुषार्थ पुस्तकालय दल ने श्री पारस प्रताप सिंह के नेतृत्व में डॉ. राजेन्द्र सिंह जी का राजस्थानी परम्परा से साफा बाँध कर स्वागत किया. कार्यक्रम का सफल सञ्चालन डॉ. योगेश कुमार पाल के द्वारा किया गया. कार्यक्रम में डॉ. आर. टी. बेदरे, डॉ. अनिल कुमार तिवारी, डॉ. संजय शर्मा, डॉ. देवेंद्र कुमार, डॉ. रानी दुबे, डॉ. संजय नैनवाल, डॉ. अरविन्द, डॉ. रामकुमार वर्मा, डॉ. नवीन सिंह, जिला साक्षरता अधिकारी श्री उमा शंकर सहित बड़ी संख्या में केन्द्रीय विद्यालय एवं विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, शोधार्थी सहित अधिकारी, कर्मचारी उपस्थित थे.











