
विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग में व्याख्यान का आयोजन
भारत में विरासतों का संरक्षण एवं पुरातात्त्विक अध्ययन के प्रति रुचि अत्यावश्यक है – डॉ. अरुण राज. टी.
सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग द्वारा ‘संजोना और संरक्षित करना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की विरासतः औपनिवेशिक उत्पत्ति, संस्थागत विकास और वैज्ञानिक विस्तार (1784-वर्तमान) विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।
इस अवसर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मध्य क्षेत्र, भोपाल के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. अरुण राज. टी. ने मुख्य व्याख्यान दिया। उन्होंने भारत में पुरातात्त्विक अध्ययन और विरासत संरक्षण के विकास की ऐतिहासिक यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. अरुण राज ने बताया कि भारत में पुरातत्त्व का विकास औपनिवेशिक काल में प्राचीन स्मारकों, अभिलेखों और पुरावशेषों के दस्तावेजीकरण एवं अध्ययन से प्रारंभ होकर धीरे-धीरे एक संगठित संस्थागत एवं वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में विकसित हुआ। उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना, संस्थागत विकास, अन्वेषण, उत्खनन, पुरातात्विक दस्तावेजीकरण, वैज्ञानिक तकनीक तथा स्मारक संरक्षण के विभिन्न चरणों को रेखांकित किया।
उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि पुरातात्विक विरासत केवल प्राचीन इमारतों, स्मारकों और पुरावशेषों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह समाज की सांस्कृतिक स्मृति और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए इन धरोहरों को संरक्षित करना वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी हमारी जिम्मेदारी है। व्याख्यान के दौरान विद्यार्थियों की भूमिका पर भी विशेष चर्चा की गई। डॉ. अरुण राज ने विद्यार्थियो को अपने आसपास स्थित पुरातात्त्विक स्थलों, स्मारकों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक होने तथा उनके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विरासत संरक्षण केवल सरकारी संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज, शोधकर्ताओं और विशेष रूप से युवाओ की भागीदारी आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. नागेश दुबे ने कहा कि भारत की पुरातात्त्विक एवं सांस्कृतिक विरासत हमारे अतीत को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि विरासत संरक्षण केवल स्मारकों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ उनसे जुड़े इतिहास, ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं को भी समझना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने आसपास की सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक रहें और उसके संरक्षण में अपनी जिम्मेदारी को समझें। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों में इस प्रकार के व्याख्यान विद्यार्थियों को अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ अपनी विरासत के प्रति संवेदनशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
व्याख्यान के माध्यम से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को भारतीय पुरातत्व के संस्थागत विकास के साथ-साथ पुरातात्त्विक अनुसंधान, वैज्ञानिक पद्धतियों और विरासत संरक्षण की बदलती प्रकृति को समझाने का अवसर मिला। कार्यक्रम ने यह भी रेखांकित किया कि पुरातत्त्व केवल अतीत के अध्ययन का विषय नहीं है, बल्कि विरासत को समझने, संरक्षित करने और भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित रूप से पहुँचाने की सामाजिक जिम्मेदारी से भी जुड़ा हुआ है। कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि भारत की समृद्ध पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए संस्थाओं, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और स्थानीय समुदायों के सामूहिक प्रयास आवश्यक है।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. प्रवीण कुमार के. थे। इस अवसर पर डॉ. सुरेंद्र कुमार यादव, डॉ. धनंजय विक्रम सिंह, डॉ. शिवकुमार पारोचे तथा डॉ. शशि कुमार सिंह, डॉ. ऋषभ भारद्वाज, डॉ. रणवीर कुमार, विभागाध्यक्ष, भौतिकी विभाग, सहित भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उप-अधीक्षण पुरातत्वविद्, विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।







