श्राद्ध आश्विन मास में ही क्यों किया जाता है? पितृपक्ष प्रारंभपितरों के तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध का विशेष महत्व, अमावस्या को ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के लिए किया जाता है तर्पण

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देवरी बिछुआ। पितृपक्ष के प्रारंभ के साथ ही सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का विशेष क्रम शुरू हो जाता है। इस दौरान पितरों की आत्मशांति एवं संतुष्टि के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या का दिन पितरों के लिए विशेष महत्व रखता है।
वैदिक एवं ज्योतिषाचार्य डॉ. अनिल दुबे वैदिक बताते हैं कि धार्मिक मान्यता के अनुसार एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र माना गया है। पितरों के लिए कृष्ण पक्ष को विशेष माना गया है। अमावस्या को पितरों का मध्याह्न माना जाता है और इस दिन किया गया श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान उन्हें संतुष्टि और ऊर्जा प्रदान करने वाला माना गया है।
डॉ. दुबे के अनुसार ज्योतिषीय मान्यताओं में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना गया है। मान्यता है कि पितृपक्ष में पूर्वज अपने वंशजों के समीप आते हैं और विधि-विधान से किए गए तर्पण एवं श्राद्ध से प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसका उल्लेख श्राद्ध संबंधी धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।
दो प्रकार से किया जाता है श्राद्ध
भारतीय संस्कृति में पितरों के लिए मुख्य रूप से दो अवसरों पर श्राद्ध किए जाने की परंपरा बताई गई है। पहला श्राद्ध पितर की मृत्यु तिथि अथवा क्षय तिथि पर और दूसरा पितृपक्ष के दौरान किया जाता है।
जिस मास और तिथि को किसी पितर का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर प्रतिवर्ष एकोदिष्ट श्राद्ध करने की परंपरा है। एकोदिष्ट श्राद्ध में एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिंड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराने का विधान बताया गया है।
मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या पर श्राद्ध
यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो अमावस्या के दिन ज्ञात-अज्ञात पितरों के लिए विधि-विधान से तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन पितरों का तर्पण करने का विशेष महत्व है।
वहीं परिवार में किसी सदस्य की अकाल मृत्यु होने पर पितृदोष की शांति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार पवित्र तीर्थस्थल पर श्राद्ध एवं तर्पण करने की परंपरा बताई गई है। सामर्थ्य के अनुसार पितरों की आत्मशांति के लिए श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भी कराया जा सकता है।
डॉ. अनिल दुबे वैदिक के अनुसार पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान का समय नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों को स्मरण करने, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और परिवार की परंपराओं से जुड़ने का अवसर भी है।
डॉ. अनिल दुबे वैदिक, देवरी बिछुआ

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