
“माँ को माँ कहने वाले हर देश में रहते हैं, लेकिन देश को माँ कहने वाले भारत में ही रहते हैं” ने बांधा समां
सागर। पंडित दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य (अग्रणी) महाविद्यालय, सागर एवं इंसाद फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में साहित्य, संस्कृति और संवेदनाओं को समर्पित अखिल भारतीय मुशायरा एवं कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन महाविद्यालय के आदि गुरु शंकराचार्य सभागार में किया गया। देश के विभिन्न अंचलों से पहुंचे प्रख्यात कवियों और शायरों की प्रस्तुतियों ने देर शाम तक श्रोताओं को बांधे रखा।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों से आए कवियों और शायरों का आत्मीय स्वागत किया गया।
स्वागत उद्बोधन में महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने देशभर से आए रचनाकारों का अभिनंदन करते हुए कहा कि विभिन्न अंचलों से आए कवि और शायर तपते सूर्य की स्वर्णिम रश्मियों के समान हैं, जिनकी वाणी से निकले कालजयी शब्द श्रोताओं के मन-मस्तिष्क को नई ऊर्जा और चेतना से भरते हैं।
मुख्य अतिथि समाजसेवी शैलेष केसरवानी ने अपने वक्तव्य से उपस्थित जनसमूह का उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. अवधेश प्रताप सिंह ने किया, जबकि मुशायरे का संचालन प्रख्यात शायर तनोज दधीचि ने किया।
देशभक्ति की पंक्तियों पर गूंजा सभागार
मुशायरे एवं कवि सम्मेलन में देश के सुप्रसिद्ध रचनाकारों ने अपनी प्रतिनिधि कविताओं और गजलों से साहित्यप्रेमियों की खूब दाद बटोरी। राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत कवि नवीन जोशी की पंक्तियां—
“माँ को माँ कहने वाले हर देश में रहते हैं, लेकिन देश को माँ कहने वाले भारत में ही रहते हैं”
सुनते ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
प्रख्यात शायर राजेश रेड्डी ने अपनी मर्मस्पर्शी पंक्तियों से श्रोताओं को भावुक कर दिया। उनकी पंक्तियां—
“शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूँ मैं, मुस्करा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं”
और
“यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है, खिलौना है यह मिट्टी का फ़ना होने से डरता है”
ने श्रोताओं को गहरी संवेदनाओं से जोड़ दिया।
इसी क्रम में सुप्रसिद्ध शायरा नुसरत मेहंदी ने अपनी रचना से प्रभाव छोड़ा—
“यह या तो यूँ ठहरो कि किरदार मिसाली कर दो, या यूँ जाओ कि कहानी खाली कर दो।”
वहीं अशोक मिज़ाज ने कहा—
“मैं समुंदरों का मिज़ाज हूँ अभी उस नदी को पता नहीं, सभी मुझसे आके लिपट गईं मैं किसी से मिला नहीं।”
पल्लवी मिश्रा की पंक्तियां—
“ऐसे कैसे दिल से निकल जाऊंगी, हाथ छोड़ोगे तो मैं फिसल जाऊंगी।”
ने भी श्रोताओं की खूब दाद बटोरी।
आदर्श दुबे ने पढ़ा—
“मुझमें अब मैं नहीं रहा बाकी, जितना चाहो कुरेद सकते हो।”
वहीं तनोज दधीचि की पंक्तियां—
“हमने कब कहा कि हमें प्यार दीजिए, आप चाहो तो दुत्कार दीजिए।”
और अश्विनी मित्तल ‘एस’ की पंक्तियां—
“एक दूजे के सामने काटे जाते हैं, हम इंसान भी बिल्कुल पेड़ों जैसे हैं।”
ने भी सभागार में मौजूद साहित्यप्रेमियों को खूब प्रभावित किया।
बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी रहे मौजूद
देर शाम तक चले इस गरिमामय आयोजन में वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. गोपा जैन, प्रशासनिक अधिकारी डॉ. इमराना सिद्दीकी, डॉ. विनय शर्मा, डॉ. संगीता मुखर्जी, डॉ. प्रतिभा जैन, डॉ. अभिलाषा जैन, डॉ. राणा कुंजर सिंह, डॉ. संदीप सबलोक, डॉ. अंकुर गौतम, डॉ. संदीप तिवारी, विश्वविद्यालय के संयुक्त कुलसचिव डॉ. संतोष सहगोरा, पंकज दीक्षित, वीरेंद्र प्रधान सहित महाविद्यालय के प्राध्यापक, अधिकारी, कर्मचारी, छात्र-छात्राएं एवं नगर के बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।
अंत में डॉ. अमर कुमार जैन ने सभी अतिथियों, रचनाकारों, आयोजकों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों के प्रति आभार व्यक्त किया।







