संघर्ष से सफलता तक कुमारी खेमा अहिरवार की दास्तान

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ग्राम रिछा की बेटी कुमारी खेमा अहिरवार की कहानी उन सभी के लिए, जो कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते। उसके पिता  इमरत अहिरवार अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए ग्राम छोड़कर पत्नी और बच्चों सहित मालथौन जा बसे। वहां पति-पत्नी दोनों ने मेहनत-मजदूरी कर अपनी बड़ी बेटी खेमा का दाखिला एक निजी विद्यालय में कराया। खेमा पढ़ाई में रुचि रखती थी, लेकिन कुछ वर्षों बाद आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई। मजदूरी करते समय पिता इमरत एक दुर्घटना का शिकार हो गए, जिससे उनके पैर में चोट लगने के बाद प्वाइजन हो गया। उनकी काम करने की क्षमता खत्म हो गई और परिवार की आर्थिक स्थिति गम्भीर रूप से प्रभावित हुई। कुमारी खेमा की मां और भाई ने हार नहीं मानी और बीड़ी बनाकर परिवार की जिम्मेदारी और पति का इलाज संभाला। लेकिन इस आर्थिक तंगी के चलते खेमा की पढ़ाई रुक गई। विद्यालय की फीस न भर पाने के कारण उसे एक-दो वर्षों तक घर बैठना पड़ा। खेमा “लाड़ली लक्ष्मी योजना” की लाभार्थी थी, जिससे उसकी आगे की शिक्षा में सहायता मिल सकती थी। इसी बीच उसके दादा ने ग्राम रिछा के शासकीय प्राथमिक शाला के प्रभारी शिक्षक  विजय सिंह गौंड से संपर्क किया और सारी स्थिति बताई। शिक्षक विजय सिंह गौंड ने खेमा की पूरी जानकारी एकत्र की और वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह लेकर उसकी उम्र के अनुसार कक्षा 5 में शासकीय विद्यालय में दाखिला करवा दिया। आज कुमारी खेमा अहिरवार नियमित रूप से कक्षा 5 की छात्रा है। वह न केवल पढ़ाई में रुचि लेती है, बल्कि विद्यालय की अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेती है। उसका आत्मविश्वास लौट आया है, और पूरे परिवार के चेहरे पर मुस्कान है। विद्यालय द्वारा उसे शैक्षणिक सामग्री और अतिरिक्त सहयोग दिया जा रहा है, जिससे वह अपने कक्षा स्तर के अनुसार सीख सके। उसके माता-पिता, दादा-दादी विद्यालय और शिक्षकों का दिल से धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने कठिन समय में उनके साथ खड़े होकर एक बच्ची की शिक्षा को फिर से जीवन दिया।

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