आज अष्टमी पर विराजेंगी देवरी की ‘सेठानी महाकाली’, 170 साल पुरानी परंपरा का होगा निर्वहन

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कंधों पर विराजमान होकर शिक्षा सदन चौराहे पहुंचेंगी जगत जननी महाकाली,

देवरीकलां (सागर)। शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर सागर जिले के देवरी नगर में आस्था और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। नगर की आराध्य एवं ‘सेठानी महाकाली’ के नाम से प्रसिद्ध कंधे की महाकाली अष्टमी के दिन शिक्षा सदन चौराहे पर विराजमान होंगी। बुजुर्गों के अनुसार, माता रानी की स्थापना की यह परंपरा करीब 170 वर्षों से अधिक पुरानी है। प्रतिवर्ष अष्टमी पर श्रद्धालु पूरे उत्साह और भक्तिभाव के साथ माता रानी की प्रतिमा को कंधों पर विराजमान कर स्थापना स्थल तक लाते हैं।

मुंडे पटवा ने शुरू की थी स्थापना की परंपरा
स्थानीय बुजुर्गों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कंधे की महाकाली की स्थापना की शुरुआत मुंडे पटवा ने की थी। बताया जाता है कि वे नगर की जेठानी महाकाली की मिट्टी से अपने हाथों से छोटी प्रतिमा तैयार करते थे। इसके बाद नवरात्रि की अष्टमी पर शिक्षा सदन चौराहे पर विधि-विधान से जगत जननी महाकाली की स्थापना की जाती थी। समय के साथ यह परंपरा देवरी नगर की धार्मिक पहचान बन गई और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही।

बाद में नामदेव परिवार ने इस परंपरा की जिम्मेदारी संभाल ली। वर्तमान में नामदेव परिवार के साथ नगर के श्रद्धालु भी माता रानी की स्थापना में सहयोग करते हैं। अष्टमी की शाम को भक्तजन शिक्षा सदन चौराहे से बल्ला दादा चित्रकार के निवास तक पहुंचते हैं। वहां से माता रानी की प्रतिमा को कंधों पर विराजमान कर श्रद्धा और उत्साह के साथ स्थापना स्थल तक लाया जाता है।

45 वर्षों तक बल्ला दादा चित्रकार ने बनाई प्रतिमा
देवरी की सेठानी महाकाली की प्रतिमा निर्माण में स्वर्गीय बलवंत सिंह धगरोटिया, जिन्हें नगर में बल्ला दादा चित्रकार के नाम से जाना जाता था, का विशेष योगदान रहा। उन्होंने करीब 45 वर्षों तक लगातार माता रानी की प्रतिमा तैयार की। लगभग तीन वर्ष पूर्व उनके निधन के बाद उनके दोनों पुत्र इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

मूर्तिकार संजय चित्रकार के अनुसार, वे और उनके भाई भोपाल से नवरात्रि के अवसर पर अपने गृह नगर देवरी पहुंचते हैं और माता महाकाली की प्रतिमा तैयार करते हैं। प्रतिमा को पूर्ण स्वरूप देने में करीब 10 से 12 दिन का समय लगता है। पिता के निधन के बाद भी दोनों भाई उनकी कला, समर्पण और धार्मिक परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।

विजयादशमी पर प्रथम चल समारोह महाकाली का होता है फिर नगर की अन्य माता रानी की प्रतिमाओं होती है निकासी
देवरी में कंधे की महाकाली की स्थापना की परंपरा अन्य धार्मिक आयोजनों से भी विशेष पहचान रखती है। अष्टमी के दिन माता रानी की स्थापना होती है और नवमी तक श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं। इसके बाद विजयादशमी के दिन कंधे की महाकाली की निकासी के साथ नगर की अन्य माता रानी की प्रतिमाओं के चल समारोह भी निकलते हैं। दशमी के दिन माता रानी का विसर्जन किया जाता है।

आस्था, विश्वास और विरासत का प्रतीक है कंधे की महाकाली
करीब 170 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा देवरी नगर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। कंधों पर विराजमान होकर शिक्षा सदन चौराहे पहुंचने वाली सेठानी महाकाली के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। नामदेव परिवार द्वारा स्थापना की परंपरा को आगे बढ़ाना और बल्ला दादा चित्रकार के पुत्रों द्वारा प्रतिमा निर्माण की जिम्मेदारी निभाना इस परंपरा को पीढ़ियों तक जीवित रखने का उदाहरण है। नवरात्रि की अष्टमी पर देवरी नगर माता रानी की भक्ति और जयकारों से भक्तिमय हो उठता है।

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