नागपंचमी आज: भगवान शिव के साथ नागदेवता की पूजा का विशेष महत्व, जानिए पूजन विधि और मान्यताएं

नागपंचमी आज: भगवान शिव के साथ नागदेवता की पूजा का विशेष महत्व, जानिए पूजन विधि और मान्यताएं
सागर। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला नागपंचमी पर्व इस वर्ष 17 अगस्त, सोमवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में नागों को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। भगवान शिव के गले में नाग का विराजमान होना और भगवान विष्णु का शेषनाग की शैय्या पर शयन करना नागों के धार्मिक महत्व को दर्शाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागपंचमी के दिन नागदेवता की पूजा करने से सर्प भय से मुक्ति, सुख-समृद्धि और परिवार की रक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हालांकि, ये धार्मिक मान्यताएं हैं, जिनका पालन श्रद्धा और परंपरा के अनुसार किया जाता है।
शेषनाग और भगवान विष्णु का संबंध
पौराणिक मान्यताओं में शेषनाग को भगवान विष्णु का परम सेवक और उनकी शैय्या के रूप में वर्णित किया गया है। मान्यता है कि भगवान विष्णु जब-जब पृथ्वी पर अवतार लेते हैं, शेषनाग भी उनके साथ अलग-अलग रूपों में अवतरित होते हैं। त्रेता युग में शेषनाग ने लक्ष्मण और द्वापर युग में बलराम के रूप में भगवान की लीला में साथ दिया।
समुद्र मंथन की कथा में भी वासुकी नाग का महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। देवताओं और दैत्यों ने वासुकी नाग को मंदराचल पर्वत के साथ मथानी की रस्सी के रूप में प्रयोग किया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के दसवें अध्याय में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए नागों में अनंत का उल्लेख किया है।
भगवान शिव के साथ नागों का विशेष महत्व
भगवान शिव के कंठ में नाग के विराजमान होने के कारण नागों को शिव के आभूषण के रूप में भी पूजा जाता है। इसी मान्यता के चलते नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा भगवान शिव की आराधना के साथ करने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यता है कि नागपंचमी के दिन शिव और नागदेवता की श्रद्धापूर्वक पूजा करने से आध्यात्मिक शांति तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
नागपंचमी से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं
नागपंचमी को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रमुख मान्यता के अनुसार राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई थी। इसके बाद उनके पुत्र जनमेजय ने नागवंश के विनाश के लिए सर्प यज्ञ कराया। कहा जाता है कि ऋषि आस्तिक मुनि ने इस यज्ञ को रोककर नागों की रक्षा की। जिस दिन यह यज्ञ रोका गया, वह श्रावण शुक्ल पंचमी का दिन माना जाता है। इसी घटना को नागपंचमी की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
एक अन्य मान्यता भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग से जुड़ी है। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने यमुना में कालिया नाग का दमन कर लोगों को उसके भय से मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण भी नागपूजा की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।
इस तरह करें नागपंचमी की पूजा
नागपंचमी के दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव का ध्यान और पूजन करने की परंपरा है। शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद नागदेवता का पूजन किया जाता है।
नागदेवता को परंपरा के अनुसार हल्दी, रोली, अक्षत, फूल, चने, खील-बताशे और प्रतीकात्मक रूप से दूध अर्पित किया जाता है। कई स्थानों पर घर के मुख्य द्वार पर गोबर, गेरू या मिट्टी से नाग की आकृति बनाकर उसका पूजन करने की भी परंपरा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा भगवान शिव के आभूषण के रूप में करना शुभ माना जाता है।
नागपंचमी पर क्या न करें?
लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागपंचमी के दिन भूमि खोदने और कुछ स्थानों पर हरी सब्जियां काटने से परहेज किया जाता है। व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिनभर संयम और सात्त्विक आहार का पालन करते हैं।
नागपंचमी प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान का संदेश देने वाला पर्व भी माना जा सकता है। इस अवसर पर जीवित सांपों को पकड़कर दूध पिलाने या उनके साथ किसी प्रकार का जोखिम लेने के बजाय प्रतीकात्मक रूप से नागदेवता की पूजा करना और वन्यजीवों की सुरक्षा का संकल्प लेना अधिक सुरक्षित है।
श्रद्धा के साथ मनाएं नागपंचमी
नागपंचमी केवल धार्मिक आस्था का पर्व ही नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा में प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान की भावना से भी जुड़ा हुआ है। श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव और नागदेवता की आराधना कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नागपंचमी पर श्रद्धा से की गई पूजा नागदेवता और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का माध्यम मानी जाती है।

पंडित जी : डॉ. अनिल दुबे वैदिक,
मोबाइल नंबर:  9936443138

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