
मोदी को करिश्माई कहे जाते हैं। चुनाव-जिताऊ। पर क्या सही में ऐसा है?
अपनी नज़र में तो मोदी ओवररेटेड हैं। अब देखिए, पिछले 10 सालों में विधानसभा चुनावों में तो हाल बुरा हो गया है। डरा-धमका कर, जोड़-तोड़ करके या खरीद-फ़रोख़्त करके विपक्षी नेता भाजपा के पाले में लाये गए हैं, तो राज्यों में भाजपा की सरकार बनती है जैसे-तैसे। पर पिछले दो आम चुनाव देखें, तो हैसियत पता चल जाती है।
2014 में मोदी नहीं जीते, कांग्रेस हारी थी। तय था। न कोई करिश्मा था, न लहर। पर देश को लूटने वाले पूंजीपति दोस्त की अकूत दौलत से चलाये विज्ञापनों के दम पर एक फर्जी ‘लहर’ पैदा की गयी।
2019 में कुछ था ही नहीं दिखाने-बताने को। GST और नोटबंदी जैसे सो-कॉल्ड मास्टरस्ट्रोक्स का नाम तक नहीं ले सकते थे मोदी । फिर अचानक एनवक़्त पुलवामा हमला होता है (जिसके कई ‘राज़’ अभी भी अनसुलझे हैं ) बिकाऊ और देश का गद्दार मीडिया चौबीसों घंटे प्रोपेगंडा चलाता है, और मोदी सेना की शहादत पर वोट मांगते हैं। जनता आपको वोट दे देती है।
अब 2024 में आम चुनाव 10 साल की उपलब्धियों पर लड़ा जा रहा है?
2020 के शुरू में जब कोरोना देश में दस्तक दे रहा था, तब वो जिसे मोदी ने करोड़ों रूपये फूँक कर दुष्प्रचार करके ‘पप्पू’ बनाया, मोदी को चेता रहा था, पर मोदी दिल्ली-हाट में बैठे लिट्टी-चोखा चबाते हुए अपने फोटो ट्वीट कर रहे थे। कुप्रबंधन के कारण लाखों नागरिकों के मर जाने के बाद भी बेशर्म होकर मोदी उत्तर प्रदेश सरकार की शान में झूठे कसीदे पढ़ आये। किसानों को खेत छोड़कर खेती बचाने के लिए साल भर सड़क पर बैठे रहना पड़ा, वर्ना मोदी तो अवैध तरीके से पास किए 3 कानूनों की आड़ लेकर अपने चोर पूंजीपति मित्र का कर्ज अदा लगभग कर ही चुके थे। 2019-24 के कार्यकाल में मोदी ने अपने पड़ोसियों या प्रतिद्वंद्वियों से हमने या तो संबंध खराब किये या कूटनीतिक मात खाई। दुनिया भर के प्रगति सूचकांकों में हम बस ढिसरते ही रहे। पिछले 3 साल में न झुकने वाले विपक्षी नेताओं, आपकी विचारधारा का समर्थन न करने वाले चिंतकों, समाजसेवियों और पत्रकारों को ED, IT और CBI के दुष्चक्र में फंसाने और और डरा-धमका कर इलेक्टोरल बॉन्ड्स के ज़रिए देश के कॉरपोरेट से की गई धन-उगाही के किस्से अब अचंभित नहीं करते।
मोदी के इस तीसरे आम चुनाव में अगर चुनाव-आयोग केवल 3 शब्द ‘धर्म’, ‘हिन्दू’, और ‘मुसलमान’ का प्रयोग वर्जित कर दे, जो कि एक पालतू, रीढ़विहीन चुनाव-आयोग कर न पायेगा, तो मोदी शायद प्रचार के नाम पर सारी रैलियाँ कैंसल करके वो ‘इंटरव्यू’ कहे जाने वाले ‘सम्बोधन’ ही कर पाएंगे बस।
तो इस भुलावे में मत रहिएगा कि मोदी बड़े महान नेता हुए और मोदी का करिश्मा था कि चुनाव जीते। अगर जनता ने अगले पाँच साल भी आपको दिए, जो कि फिलहाल तो संदेहास्पद लग रहा है, तो मोदी की पार्टी ने जारी किया हुआ संकल्प-पत्र भूल कर अपना उद्देश्य 2029 के आम चुनाव में केवल अपनी उपलब्धियों पर वोट माँगना ही रखियेगा।
जै सियाराम!











